श्री गांधी के आमरण अनशन पर बी.आर. अम्बेडकर द्वारा जारी किया गया बयान - Page 341

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बहादुर द्वारा दोषारोपण करने पर मुझे कहना पड़ता है कि जब वह इंडियन सेंट्रल कमेटी के सदस्य थे, तब उन्होंने क्या किया था? उस कमेटी की रिपोर्ट में दलित वर्गों को मद्रास में 150 सीटों में से दस सीटें, बम्बई में 14 में से 8 सीटें, बंगाल में 200 में से 8 सीटें, संयुक्त प्रांत में 182 में से 8, पंजाब में 166 में से 6 सीटें, बिहार और उड़ीसा में 150 में से 6 सीटें, मध्य प्रांत में 125 में से 8 सीटें और असम में दलित वर्गों और आदिमजातियों को 75 में से 9 सीटें मिली थीं। मैं इस बयान पर और कुछ नहीं कहना चाहता कि सीटों का उपरोक्त बंटवारा कहां तक जनसंख्या के अनुपात से मेल खाता है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बंटवारा दलित वर्गों के यथोचित प्रतिनिधित्व बहुत कम है। स्वयं राजा जी सीटों के उस बंटवारे में एक पक्ष थे। सांप्रदायिक पंचाट की आलोचना करने से पहले राजा साहब को अपनी स्मृति को झंझोड़ कर देखना चाहिए कि उन्होंने इंडियन सेंट्रल कमेटी में बिना कोई विरोध किए सीटों के उस बंटवारे को दलितों की ओर से कैसे स्वीकार कर लिया? राजा साहेब के अनुसार यदि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व का सिद्धांत दलित वर्गों का प्राकृतिक अधिकार था, तो उस अधिकार की सुरक्षा करना नितांत आवश्यक था। परंतु प्रश्न यह है कि राजा साहब ने सेंट्रल कमेटी में उस पर क्यों नहीं जोर दिया जब कि ऐसा करने के लिए उन्हें अवसर भी मिला था?

उनके कथन से कि सांप्रदायिक पंचाट में दलित वर्गों को सवर्ण हिंदुओं से अलग कर दिया गया हैं, मैं सहमत नहीं हूं। यदि राजा साहेब को वास्तव में पृथक निर्वाचन पर कोई आपत्ति है, तो पृथक निर्वाचन में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने के लिए उन पर कोई दबाव नहीं डालेगा। राजा साहेब पूरे जोरों से दलित वर्गों को विश्वास दिलाते हैं कि अब दलित वर्गों के प्रति सवर्ण हिंदुओं का हृदय परिवर्तन हो गया है। उन्हें यह प्रमाणित करने का अवसर मिलेगा, सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचित होने पर भी दलित वर्गों के लोगों को अभी उनकी जबानी जमाखर्ची पर विश्वास नहीं है। हिंदू दलित वर्गों के प्रति जो पे्रम और सहानुभूति जता रहे हैं उन्हें श्री राजा साहेब को सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र से विधानमंडल में भेजने का अवसर मिलेगा। वे तब अपनी ईमानदारी का परिचय दें।

इसीलिए मेरे विचार से जो लोग पृथक निर्वाचन के पक्ष में हैं तथा जो संयुक्त निर्वाचन के पक्ष में हैं, दोनों को सांप्रदायिक पंचाट ने से संतुष्ट कर दिया है। इस अर्थ में यह एक समझौता है। इसे ज्यों का त्यों सबको मान लेना चाहिए। जहां तक श्री गांधी की बात है, मैं नहीं जानता कि वह क्या चाहते हैं? ऐसा समझा जाता है कि यद्यपि श्री गांधी पृथक निर्वाचन प्रणाली के विरुद्ध हैं तथापि वह संयुक्त निर्वाचन और सीटों के संरक्षण के विरोध में नहीं हैं। यह बहुत बड़ी भूल है। आज उनके विचार