परिशिष्ट
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कुछ भी हों, जब वह लंदन में थे, तब किसी ऐसी व्यवस्था के पूर्णतया विरुद्ध थे, चाहे वह संयुक्त निर्वाचन अथवा पृथक निर्वाचन अथवा पृथक निर्वाचन के संबंध में हो। वयस्क मताधिकार पर आधारित सामान्य निर्वाचन में मत देने के अधिकार के अतिरिक्त श्री गांधी विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व देने की अस्पृश्यों की मांग को मानने के लिए तैयार नहीं थे। यह वह स्थिति थी, जो श्री गांधी ने पहले अपनाई थी। गोलमेज सम्मेलन की समाप्ति पर श्री गांधी ने मुझे एक योजना सुझाई थी, जिसके लिए उन्होंने कहा था कि वह उस योजना पर विचार करने के लिए तैयार हैं। वह योजना पूर्णतया परंपरागत थी, जिसकी कोई संवैधानिक मान्यता नहीं थी। उस योजना के अंतर्गत निर्वाचन कानून के अनुसार एक भी सीट दलित वर्गों के लिए सुरक्षित नहीं रखी गई थी। वह योजना इस प्रकार थीःµ
दलित वर्ग के उम्मीदवार सामान्य निर्वाचन में, अन्य सवर्ण हिंदु उम्मीदवारों के मुकाबले में खड़े हो सकते है। यदि दलित उम्मीदवार सामान्य निर्वाचन-क्षेत्र में चुनाव हार जाए, तो वह इस आधार पर चुनाव याचिका दायर कर सकता है कि उसे अस्पृश्य होने के कारण पराजित कर दिया गया है। यदि इस आधार पर अस्पृश्य उम्मीदवार के पक्ष में फैसला हो जाता है, तो श्री गांधी ने कहा कि वह कुछ हिंदू सदस्यों को सीट दिलाने के लिए त्यागपत्र देने के लिए कहेंगे। तब दुबारा चुनाव होगा। उस चुनाव में सवर्ण हिंदू उम्मीदवार के विरुद्ध वह अथवा अन्य अस्पृश्य उम्मीदवार खड़ा होकर अपना भाग्य आजमाएगा। यदि वह दुबारा चुनाव हार जाता है, तो वह पुनः उसी आधार पर चुनाव याचिका दायर करेगा कि उसे अस्पृश्य होने के कारण हरा दिया गया है और यह सिलसिला बेरोकटोक चलता रहेगा। मैं इन तथ्यों को इसलिए उजागर कर रहा हूं कि कुछ लोगों को अब भी भुलावा है कि संयुक्त निर्वाचन तथा आरक्षित सीटों से ही श्री गांधी की आत्मा को शांति मिल जाएगी। मैं इसीलिए इस बात पर जोर दे रहा हूं कि जब तक श्री गांधी की ओर से कोई वास्तविक प्रस्ताव सामने नहीं आते, इस प्रश्न पर विचार करना व्यर्थ है।
कुछ भी हो मैं यह बता देना चाहता हूं कि मैं श्री गांधी तथा उनकी कांगे्रस के आश्वासनों पर विश्वास नहीं कर सकता कि वे आवश्यक कदम उठाएंगे। मैं अपने लोगों के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को परंपराओं और आश्वासनों के भरोसे नहीं छोड़ सकता। श्री गांधी अमर व्यक्ति नहीं है और कांगे्रस पर कोई ऐसा नैतिक दबाव नहीं है, जो उनकी बात सदैव ब्रह्म वाक्य मान कर चले ही। भारत में बहुत से महात्मा आए, जिनका एकमात्र उद्देश्य अस्पृश्यता मिटाना और अस्पृश्यों का उद्धार करना था। सभी महात्माओं को असफलता हाथ लगी। महात्मा लोग आए और चले गए, लेकिन अस्पृश्य सदैव अस्पृश्य ही बने रहे।