ट्रावनकोर में मंदिर प्रवेश - Page 345

330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परिशिष्ट - पांच

ट्रावनकोर में मंदिर प्रवेश

ट्रावनकोर के महाराजा ने दिनांक 12 नवंबर, 1936 को अपने राज्य में अस्पृश्यों के लिए मंदिर खोलने की घोषणा की। घोषणा इस प्रकार थीःµ

फ्अपने धर्म में सत्य और उसकी व्यापकता पर हमें गहरा विश्वास हो गया है कि हमारा धर्म पवित्र निर्देशों पर आधारित है, इसमें व्यापक सहनशीलता है, और यह जानते हुए कि शताब्दियों से यह धर्म समय की आवश्यकता के अनुसार अपने को बदलता चला आया है। अब हमारी इच्छा है कि हमारी हिंदू प्रजा में किसी को जन्म के कारण, जाति अथवा संप्रदाय के कारण हिंदू धर्म से प्राप्त होने वाली सुख शांति से इंकार नहीं किया जा सकता। हमने निश्चय किया है और घोषणा करते हैं और आदेश देते हैं कि लागू नियमों और शर्तों के अंतर्गत अब भविष्य में किसी भी हिंदू को जन्म अथवा धर्म के आधार पर हमारे राज्य द्वारा संचालित एवं नियंत्रित मंदिरों में प्रवेश करने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा।य्

कांगे्रसियों और श्री गांधी द्वारा इस घोषणा पर बहुत कुछ कहा गया है। उस घोषणा को हिंदू जगत में नई चेतना का जन्म बतलाया गया है। मुझे इस बात पर पूरा विश्वास नहीं है। कुछ भी हो इसका दूसरा पक्ष कुछ और भी है जिस पर ध्यान देना श्रेयस्कर है।

उपरोक्त घोषणा ट्रावनकोर के महाराजा ने अपने नाम से प्रसारित की थी। परंतु वास्तव में इसके पीछे उनके प्रधानमंत्री श्री सी.पी. रामास्वामी अय्यर का हाथ था। उसके ध्येय को समझना होगा। श्री सी.पी. रामास्वामी अय्यर 1932 में भी उन्हीं महाराजा के प्रधानमंत्री थे। 1932 में जब श्री गांधी ने गुरूवयूर मंदिर में अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के बारे में विवाद खड़ा किया था तब श्री अय्यर जो व्यक्तिगत रूप से कट्टर हिंदू हैं, उस विवाद में उनका पक्ष ले रहे थे, जो मंदिर प्रवेश के विरुद्ध थे। उन्होंने इस विषय पर निम्नलिखित बयान ख्1, समाचारपत्रों में छपवाया थाःµ

फ्व्यक्तिगत रूप से मैं जाति-पाति के नियमों को नहीं मानता। मैं समझता हूं कि अभी तक लोगों में अंधविश्वास है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि मंदिरों में पूजा-पद्धति दैवी आदेशों पर आधारित है। इस समस्या का स्थाई समाधान पारस्परिक समायोजन और हिंदू समाज के धार्मिक तथा सामाजिक नेताओं की जागृति और वर्तमान स्थिति को पहचान कर चलने से ही संभव है। ऐसा सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है, जिससे हिंदू जाति की एकता मजबूती से कायम रह सके।

  1. टाइम्स ऑफ इंडिया, 10 नवंबर, 1932