332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मंदिर प्रवेश विधेयक पर विवाद के दौरान सर पन्नीरसेल्वम ने कुछ तथ्य प्रस्तुत किए थे, यदि वे सच हैं, तो घोषणा का सारा खोखलापन स्पष्ट हो जाता है।
सर पन्नीरसेल्वम ने कहा थाःµ
फ्प्रधानमंत्री ने जो तर्क किए हैं, उनमें से एक था ट्रावनकोर में अस्पृश्यों के लिए मंदिर खोल देना। महाराजा को जिसे निरंकुश शक्तियां प्राप्त हैं, उनके अनुसार उन्होंने आदेश दिए हैं। परंतु यह सब कैसे हो रहा है? इस संबंध में जो आपत्तियां प्राप्त हुई हैं, उनसे विश्वास होता है कि उत्साह की पहली लहर के बाद जब से हरिजनों को मंदिर में जाने की अनुमति मिली है, तब से उन्होंने उन मंदिरों में पूजा-पाठ करना बंद कर दिया है, जो पहले वहां जाया करते थे। मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि वह बताए कि क्या इस कदम से कोई सफलता मिली है?य्
विधेयक के तृतीय वाचन पर सर टी. पन्नीरसेल्वम ने जो बयान दिया था, उससे बहुत से लोगों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा -
फ्महाराजा जानना चाहते थे कि क्या यही सत्य है कि पटरानी के निजी मंदिर को घोषणा से मुक्त रखा गया है? इसका क्या कारण था? फिर पटरानी की पुत्री के विवाह के उत्सव के दौरान यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि मंदिर की शुद्धि कराई जाए और उनसे शुद्धिकरण के लिए कहा गया। यदि मंदिरों की इस प्रकार शुद्धि की जाने लगी, तो उस घोषणा का क्या महत्व हुआ?य्
इन तथ्यों को चुनौती देने का साहस सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर अथवा सी. राजगोपालाचारी किसी को नहीं हुआ। जाहिर है उन तथ्यों को चुनौती दी ही नहीं जा सकती थी।
ट्रावनकोर में समाज सुधार के लिए मंदिर प्रवेश ही गिनाया जा सकता है। क्या धार्मिक स्तर पर समानता लाने के लिए इस प्रकार से मंदिर प्रवेश से ही सब कुछ हो सकता है? उदाहरणार्थ क्या देवस्थान विभाग अछूतों और शूद्रों के हाथों में सौंप दिया जाएगा? घोषणा को नौ वर्ष हो गए हैं परंतु ट्रावनकोर में धर्म के लोकतंत्रीकरण की दिशा में कुछ भी नहीं किया गया।
क्या ट्रावनकोर के अस्पृश्य मंदिर प्रवेश की कुछ कीमत चुकाएंगे? मैं कुछ नहीं कह सकता। परंतु मैं यहां पर आल ट्रावनकोर पुलयार चर्मार आयकिआ महासंघम का पत्र जो मुझे संबोधित हैं, नीचे उद्धृत करना चाहूंगा। यह पत्र 24 नवंबर, 1938 का है।