ट्रावनकोर में मंदिर प्रवेश - Page 348

परिशिष्ट

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कैम्प मय्यानाड

क्विलोन - 24-11-1938

सेवा में,

डॉ. अम्बेडकर,

बम्बई।

आदरणीय महोदय,

मैं निम्नलिखित तथ्यों की ओर सादर आपका ध्यान आकर्षित करते हुए आप की अमूल्य सलाह जानना चाहता हूं। ट्रावनकोर की हरिजन जाति का नेता होते हुए मेरा यह परम कर्तव्य है कि इस राज्य के हरिजनों को जिन मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है, उनकी ओर आपका ध्यान दिलाऊं।

  1. ट्रावनकोर राज्य के महाराजा ने मंदिर प्रवेश की जो घोषणा की है वह हरिजनों के लिए वास्तव में एक वरदान है। परंतु हरिजन मंदिर प्रवेश के अतिरिक्त अन्य सामाजिक कष्टों को भुगत रहे हैं। सरकार हरिजनों के उत्थान के लिए कोई कदम नहीं उठाती।

  2. पन्द्रह लाख हरिजनों में कुछ गे्रजुएट हैं, आधा दर्जन गे्रजुएट से नीचे और 50 स्कूल फाइनल तथ 200 से अधिक वर्नाक्यूलर सर्टिफिकेट वाले हैं। यद्यपि सरकार ने लोक सेवा आयोग बनाया है, परंतु हरिजनों की बहुत ही कम नियुक्ति हो जाती है। सभी नियुक्तियां सवर्णों की होती हैं। यदि किसी हरिजन की नियुक्ति की जाती है, तो केवल एक दो सप्ताह के लिए। सार्वजनिक सेवाओं में भरती के नियमों के अनुसार प्रार्थी को एक साल बाद ही पुनः प्रार्थनापत्र देने की अनुमति है जबकि सवर्ण हिंदू को एक साल अथवा उससे अधिक समय के लिए नियुक्त किया जाता है। जब सभा के सामने नियुक्तियों की सूची लाई जाती है, तो सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के अनुसार नियुक्तियां दिखाई जाती हैं। परंतु कुल सेवा काल एक सवर्ण के बराबर होगा। इस प्रकार सार्वजनिक सेवा सवर्णों की जागीर बनी हुई है। हरिजनों को इससे कोई लाभ नहीं।

  3. कुछ वर्ष पहले महाराजा ने घोषणा की थी कि प्रत्येक हरिजन को रहने के लिए तीन एकड़ जगह दी जानी चाहिए, परंतु कार्यकर्ता लोग जो सवर्ण हिंदू हैं, घोषणा को लागू ही नहीं करते, यद्यपि सरकार कस्बों के पास चरागाह की जमीन उन्हें देना चाहती है। परंतु हरिजन को कोई जमीन नहीं दी जाती है। हरिजन सवर्ण के घेरे में ही रहते हैं और अनेक मुसीबतों से होकर गुजर रहे हैं। यद्यपि बहुत सारी भूमि फ्सुरक्षितय् पड़ी हुई है, परंतु हरिजनों के प्रार्थना-पत्र पहुंचने पर भी उन्हें जमीन नहीं दी जाती और न कोई सुनवाई होती है। अधिकतर भूमि पर सवर्ण हिंदू काबिज हैं।