334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार हरिजन जाति के प्रत्येक सदस्य को प्रत्येक वर्ष विधान सभा में नामजद करती है। यद्यपि वे हरिजनों की मुसीबतों को सभा में प्रस्तुत करने के लिए चुने जाते हैं। वे केवल सरकार की मशीन समझे जाते हैं। अर्थात् सवर्ण हिंदुओं के खिलौने, जिनसे सवर्ण हिंदू लाभान्वित होते हैं। इस तरह हरिजनों की मुसीबतें दूर नहीं की जा सकती।
ट्रावनकोर के सभी हरिजन खेतिहर मजदूर हैं। वे सवर्ण हिंदुओं के नौकर हैं, जिनके साथ वे बर्बरता का व्यवहार करते हैं और कोई उनकी रक्षा नहीं करता। राज्य में प्रत्येक हरिजन को दैनिक मजदूरी एक आना दी जाती है। मंदिर प्रवेश के बाद भी सामाजिक कठिनाइयां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। ट्रावनकोर राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में फैले कारखानों में काम करने वाले तथा राज्य के अधिकारी सभी सवर्ण हिंदू हैं और वे उत्तरदायी सरकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं। हरिजन और कारखानों में नौकरियों की मांग कर रहे हैं, परंतु ट्रावनकोर का आंदोलन सवर्ण हिंदुओं का आंदोलन है, जिसके द्वारा वे सरकारी नौकरियों और कारखानों में हरिजनों को निकालने का प्रबंध कर रहे हैं। वे अधिक ऊंचे वेतन और सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। वे हरिजन मजदूरों की ओर कोई ध्यान नहीं देते, जबकि ट्रावनकोर के लोग कारखानों के मजदूरों के आंदोलन से पागल हो उठे हैं। हरिजन कर्मचारियों का वेतनमान बहुत कम है जबकि अन्य मिल मजदूरों का वेतन उनसे तीन गुना अधिक है।
भूख और जीवनयापन के पर्याप्त साधन न होने के कारण हरिजनों के बच्चे क्षुब्ध हो जाते हैं, जिनसे उनके बच्चे स्कूलों में अनुत्तीर्ण हो सकते हैं। घोषणा से पहले हाई स्कूलों की परीक्षा में बैठने के लिए 6 वर्षों की छूट हुआ करती थी, जो अब घटा कर तीन वर्ष कर दी गई है जिससे असफल होने पर बड़ी तादाद में विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ दी है।
दलित वर्गों के लिए एक विभाग है, जिसके अध्यक्ष सी.ओ. दामोदरन (पिछड़ी जातियों के संरक्षक) हैं। यद्यपि खर्च के लिए बड़ी धनराशि स्वीकार की जाती है और वर्ष के अंत में उसकी करामात से लगभग दो तिहाई धनराशि खर्च नहीं हो पाती। वह सरकार को रिपोर्ट दे दिया करते हैं कि धन और खर्च करने का कोई रास्ता नहीं है। दलित वर्गों के लिए नियत राशि में से 95 प्रतिशत धनराशि कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर खर्च होती है, जो सवर्ण होते हैं और केवल पांच प्रतिशत से ही दलित लाभान्वित हो पाते हैं। अब ट्रावनकोर के तीन क्षेत्रों में सरकार कुछ कालोनियां बनवाने जा रही है। अधिकारी सवर्ण हिंदू हैं। मेरे विचार से योजना सफल न होगी, क्योंकि सरकार उस पर कोई ध्यान नहीं देती है। मुझे अफसोस है कि ट्रावनकोर सरकार हरिजनों के हित में एक आना खर्च करती है, जबकि कोचीन राज्य उसी मद पर एक रुपया खर्च जाता है।