परिशिष्ट
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ट्रावनकोर की अधिकतर प्रजा राज्य कांगे्रस संस्था के अंतर्गत उत्तरदायी सरकार की मांग के लिए बड़े जोरों से आंदोलन कर रही है। उस संस्था के नेता राज्य की उन चार बड़ी जातियों से संबंधित हैं - नायर, मुसलमान, क्रिश्चियन और इजवा जाति। राज्य कांगे्रस के अध्यक्ष श्री थानू पिल्लई ने एक बयान जारी किया है, जिसमें उन्होंने दलित वर्गों के लिए विशेष छूट पर जोर दिया है। दलित वर्ग के सभी नेता राज्य कांगे्रस के रुख की प्रतिक्षा कर रहे हैं। अब हम समझते है कि उन नेताओं के वादों में कोई यथार्थ नहीं है।
अब मुझे पूरा विश्वास है कि नेताओं ने दलित वर्ग के हितों की उपेक्षा की है। कांगे्रस की शुरूआत राष्ट्रीयता के सिद्धांत पर हुई थी, परंतु अब यह पूर्णतया सांप्रदायिक संस्था हो गई है। नेताओं में अब सांप्रदायिक भावना घर कर गई है। सभी सार्वजनिक सभाओं में केवल उन्हीं चार बड़ी जातियों की बात की जाती है और हमारे विषय में कोई सोचता तक नहीं। मुझे डर है कि यदि ट्रावनकोर के राजनीतिक आंदोलन के नेताओं की यही गति रही तो उत्तरदायी सरकार प्राप्त हो जाने पर दलित वर्गों की दशा और भी दयनीय हो जाएगी, क्योंकि तब उपरोक्त चारों बड़ी जातियों की मुट्ठी में ही वह पूरी सरकार होगी और दलित वर्गों के सभी अधिकार और सुविधाएं उन जातियों द्वारा छीन ली जाएंगी। राज्य कांगे्रस की कार्य समिति की बैठकों में लगभग दो तिहाई समय अलेप्पी नारियल जटा फैक्टरीज की हड़ताल के संबंध में वाद-विवाद पर खर्च हो जाता है, परंतु हरिजन कर्मचारियों के विषय में जो ढेर सारी परेशानियों से होकर गुजर रहे हैं, बैठक में कोई विचार नहीं किया जाता। उन कारखानों में कर्मचारी सवर्ण जातियों के हैं और उत्तरदायी सरकारों की प्राप्ति का आंदोलन हरिजन आंदोलन के विरुद्ध है। राज्य कांगे्रस के प्रत्येक नेता का ध्येय है - सवर्ण जातियों को उठाना। बड़ी जातियों के नेता केवल स्वार्थी प्रवृत्ति के हो गए हैं, जो अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए दलित वर्गों की बलि देने जा रहे हैं।
राज्य के दलित वर्ग की यह दयनीय दशा है। राज्य में हमारे अपने अधिकारों को मांगे जाने के क्या तरीके हो सकते हैं। ऐसे समय में आपकी अमूल्य सलाह का मैं अनुरोध करता हूं और आपके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूं।
कष्ट के लिए क्षमा करें,
आपका विश्वासपात्र
श्रीनारायण स्वामी
यदि मंदिर प्रवेश योजना अंततः अस्पृश्यों को उनके स्थाई अधिकारों से वंचित करने की है, तो ऐसा आंदोलन आध्यात्मिक भावना के विरुद्ध ही नहीं, वरन् शरारतपूर्ण है और ऐसी दशा में ईमानदार लोगों का दायित्व हो जाता है कि अस्पृश्यों को ऐसे
खतरों से सचेत कर दें।