परिशिष्ट
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इस तर्क की मान्यता को बल मिलता है कि भारत के राष्ट्रीय जीवन में अनुसूचित जातियों के लोगों का पृथक एवं महत्वपूर्ण अस्तित्व है और सभी प्रकार के प्रस्तावों और संवैधानिक क्रियाकलाप में उनकी सहमति की नितांत आवश्यकता है। क्रिस्प प्रस्तावों के बनने से बहुत पहले ब्रिटिश सरकार के दोनों प्रतिनिधि भारत सचिव तथा वायसराय ने भी इसी प्रकार के विचार प्रकट किए थे। खासतौर पर श्री ऐमरी के 14 अगस्त, 1940 तथा लार्ड लिनिलिथगो के 10 जनवरी, 1940 के वक्तव्य ध्यान देने योग्य हैं। मुझे आशा है कि इन घोषणाओं के अध्ययन से वे लोग जो अनुसूचित जातियों के राजनीतिक अधिकारों को नकारने के प्रयत्न करते हैं, समझेंगे कि उनका अनावश्यक प्रचार कितना मूर्खतापूर्ण एवं द्वेषभावना से परिपूर्ण है।
(1)
भारतीय संवैधानिक सुधार, 1917 पर मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट से अंश।
155 - हमने यह अनुभव किया है कि प्रजा को राजनीतिक शिक्षण प्रदान करने में बहुत तेजी नहीं लाई जा सकती। यही नहीं यह कठिन प्रक्रिया भी होगी। जब तक उस प्रक्रिया को पूरा नहीं कर लिया जाता, इस प्रजा को उन लोगों द्वारा दबाने का
खतरा बराबर बना रहेगा, जो उसकी अपेक्षा कहीं बहुत अधिक बलवान और चतुर हैं और जब तक यह बात स्पष्ट नहीं हो जाती कि वे अपने हाथों अपनी सुरक्षा अपने हितों की सुरक्षा कर सकते हैं अथवा विधान परिषदों में उन्हें प्रतिनिधित्व मिले जिससे उनके हितों पर विचार किया जा सके। हमें उस रैयत की अवश्य सुरक्षा करनी है। यही समस्या दलित जातियों के साथ है। इसके लिए हमें ऐसी अच्छी व्यवस्था करनी है कि उन्हें अंततः ऐसी राजनीतिक शिक्षा मिले कि वे अपने हितों की ओर अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकें। परंतु ऐसा देखा गया है कि उनके हितों की हानि होती है और फलतः वे सामान्य प्रगति में कोई भाग नहीं लेते। हमें उनकी सहायता का कार्य अपने हाथों में रखना चाहिए।
(2)
साउथबरो मताधिकार समिति की रिपोर्ट पर भारत सरकार द्वारा पे्रषित दिनांक 23 अपै्रल, 1919 के पांचवे पत्र से अंश
13-समिति द्वारा जिन समुदायों के लिए गैर-सरकारी नामजदगी की सिफारिश की गई हम लोगों ने इस बयान में उसका विश्लेषण किया है।
हम लोग आमतौर से इन प्रस्तावों पर सहमत हैं। परंतु हम लोगों के विचार से एक समुदाय ऐसा है जिन पर समिति ने जितना ध्यान दिया है, उससे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय संवैधानिक सुधार पर रिपोर्ट ने दलित वर्गों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी है और उसे स्वीकार करने का संकल्प किया है।