अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को मान्यता - Page 353

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हमारा इरादा है कि हम, उनके प्रतिनिधित्व के लिए, जितनी अच्छी व्यवस्था कर सकते हैं, करें। समिति की रिपोर्ट में इन जातियों को फ्हिंदू-अन्य लोगय् के शीर्षक में लिखा गया है। यद्यपि वे विभिन्न रूपों में परिभाषित की गई हैं। ये सब एक समान वर्ग हैं और उन्हें बिल्कुल बहिष्कृत करके रखा गया है। न्यूनाधिक उनकी स्थिति मद्रास के पंचम लोगों जैसी है, जो निश्चित तौर पर हिंदू जाति से बहिष्कृत कही जाती हैं, जिन्हें मंदिरों में नहीं जाने दिया जाता। इनकी संख्या कुल जनसंख्या का लगभग पांचवां भाग है और उन्हें मारले मिंटो काउंसिलों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। समिति की रिपोर्ट में दलित जातियों का दुबारा उल्लेख किया गया है, परंतु केवल यह स्पष्ट करने के लिए कि संतोषजनक चुनाव न होने पर उन्हें नामजदगी द्वारा प्रतिनिधित्व दिया गया है। रिपोर्ट में उन लोगों की स्थिति और स्वावलंबन पर अधिक विचार नहीं किया गया है। उनकी स्थिति भी ऐसी नहीं है कि अपनी क्षमता को स्वयं जान सकें। रिपोर्ट में उनकी नामजदगी की संख्या भी ठीक से नहीं सुझाई गई है। रिपोर्ट के 24वे पैरा में दलित जातियों के लिए नामजदगी की सीटों पर बांधी गई सीमा का औचित्य बताया है। उसका कोई आधार नहीं दर्शाया गया है कि यह प्रसंग दलित जातियों का है। समिति ने निम्नलिखित सीटें नामजदगी के लिए प्रस्तावित की हैं।

कुल सीटें डीप्रेस्ड क्लासेस कुल सीटें डीपे्रस्ड क्लासेस

की जनसंख्या के लिए सीटें

(मिलियनों में)

मद्रास 39.8 6.3 120 2 बम्बई 19.5 .6 113 1 बंगाल 45.0 9.9 127 1 संयुक्त प्रांत 47.0 10.1 120 1 पंजाब 19.5 1.7 085 - बिहार एवं उड़ीसा 32.4 9.3 100 1 मध्य प्रांत 12.2 3.7 072 1 असम 12.2 3.7 54 - कुल 221.4 41.9 791 7

ये आंकड़े अपने आप में स्वतः प्रमाण हैं। इस व्यवस्था में ब्रिटिश भारत की समस्त जनसंख्या के पांचवे भाग को कुल आठ सौ सीटों में से केवल सात सीटें