अस्पृश्यों के पृथक अस्तित्व को मान्यता - Page 355

340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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साइमन कमीशन रिपोर्ट - भाग दो से अंश

78 - अन्य किसी भी प्रांत में उन दलित जातियों के लोगों की संख्या का आकंलन करना संभव नहीं प्रतीत होता, जो मतदान के सुयोग्य पात्र हों। यह स्पष्ट है कि मताधिकार का विस्तार दलित जातियों तक करके उनके मतदाताओं की संख्या तो बढ़ जाएगी, परंतु उस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में उनके अपने प्रतिनिधि चुने जा सकेंगे, जब तक कि इसके लिए कोई व्यवस्था न कर दी जाए। आगे चलकर दलित वर्ग की उन्नति इस बात पर निर्भर करेगी कि अपनी संख्या के आधार पर अन्य वर्गों के लिए वे कहां तक महत्वपूर्ण बन सकते हैं।

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80 - आप देखेंगे कि हमने दलितवर्ग के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों की सिफारिश नहीं की है। आरक्षित प्रतिनिधित्व के प्रस्तावित मापदंड से दलित वर्ग के सदस्यों की संख्या काफी बढ़ जाएगी। व्यापक निर्धनता और अशिक्षा के शिकार इन लोगों के लिए यह संभव नहीं है कि उनमें से सुयोग्य सदस्य तुरंत मिल सकें, बजाए इसके कि उनकी संख्या बढ़ाई जाए। उनकी बड़ी संख्या में वे प्रभावहीन व्यक्ति ऊंची जातियों के हिंदुओं के चापलूस होंगे। विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों के बीच सीटों के पुनर्वितरण का जो प्रयत्न किया जा रहा है, वह स्थाई नहीं हो सकता और पुनरीक्षण का प्रावधान अवश्य होना चाहिए। परंतु हम सोचते हैं कि इस समय हमारा प्रस्ताव पर्याप्त है खासतौर से विभिन्न श्रेणियों के आरक्षण से यह आशय नहीं है कि वे अनारक्षित सीटों पर लिए ही न जाएं।

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साइमन कमीशन द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों के संबंध में भारत सरकार के पत्र से अंश

35 - दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व - दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए कमीशन द्वारा दिए गए सुझावों की प्रांतीय सरकारों द्वारा काफी आलोचना हुई है। प्रत्येक प्रांत के लिए दलित जाति की परिभाषा करने की कठिनाई संभवतः इस वर्ग की नामजदगी की अपेक्षा विशेष प्रतिनिधित्व की योजना में अंतर्निहित है। परंतु कमीशन के प्रस्तावों में इस विशिष्ट संशय के काम को प्रांतीय गवर्नर पर छोड़ दिया गया है कि वह दलित वर्ग के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों को प्रमाणित