344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संविधान सभा द्वारा गठित संविधान से वे सहमत नहीं होंगे। वे संविधान निर्माण संबंधी विचार विमर्श में संख्या बल सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं और अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने का दावा करते हैं। सही बात दूसरे बड़े समुदाय अनुसूचित जातियों पर लागू होती है, जो अनुभव करते हैं कि श्री गांधी के प्रयत्नों के बावजूद हिंदुओं की प्रतिनिधि कांगे्रस से वह अपने को बिल्कुल अलग समझते हैं।य्
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श्री एल.एस. एमरी, भारत सचिव द्वारा हाउस आफ कामंस में 23 अपै्रल, 1941 को दिए गए भाषण से अंश
भारत के भावी संविधान का निर्माण ब्रिटिश सरकार द्वारा नहीं वरन् स्वयं भारतीयों द्वारा किया जाना चाहिए। भारत का भावी संविधान अनिवार्य रूप से भारतीय ही होना चाहिए। वह संविधान भारतीय आवश्यकताओं, उसकी परिस्थितियों तथा उसकी परंपराओं के अनुरूप हो। आवश्यक शर्त केवल यह है कि संविधान स्वयं अपने आप में तथा संविधान निर्मात्री संस्था का गठन भारत के सभी प्रमुख वर्गों की सहमति से होना चाहिए।
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भारत के वायसराय एवं गवर्नर जनरल, लार्ड लिनलिथगो द्वारा 8 अगस्त, 1940 को जारी किए गए वक्तव्य से अंश
दो मुख्य मुद्दे उभर कर सामने आए हैं। इन दोनों मुद्दों पर ब्रिटिश सरकार ने मुझे स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। पहला मुद्दा भावी संवैधानिक स्वरूप में अल्पसंख्यकों की स्थिति से संबंधित है। भारत की शांति और कल्याण के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार अपने वर्तमान दायित्वों को ऐसी शासन व्यवस्था को हस्तांतरित नहीं कर सकती, जिसमें भारत के राष्ट्रीय जीवन में शक्तिशाली बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अस्वीकार किया जाए। न ही वे ऐसी सरकार के इन तत्वों के अत्याचारों को सिर झुका कर सहते रहेंगे।