क्रिप्स प्रस्तावों का विरोध - Page 365

350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परिशिष्ट - 9

क्रिप्स प्रस्तावों का विरोध

क्रिप्स प्रस्तावों के अस्पृश्यों पर प्रभाव के विषय में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का बयान -

युद्धकालीन मंत्रिमंडल के प्रस्तावों से अचानक ब्रिटिश सरकार की मंशा स्पष्ट हो जाती है। ये प्रस्ताव वही हैं, जिनकी ब्रिटिश सरकार ने कभी अल्पसंख्यक अधिकारों का अतिक्रमण बता कर निंदा की थी। यह म्यूनिक भावना है, जिसका सारतत्व है, एक की बलि चढ़ाकर दूसरे को जीवन दान देना। यह वही भावना है, जो अब प्रस्ताव के रूप में लिपिबद्ध होकर आई है। ऐसी सूचना मिली है कि अमरीका और अंगे्रज लोग भारतीय लोगों से क्षुब्ध हैं, जिससे वे भारत की संवैधानिक प्रगति से संबंधित ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों को पसंद नहीं करते और सर स्टेफर्ड क्रिप्स के मिशन को विफल करना चाहते हैं। अमरीकी लोगों का रूख तो समझ में भी आता है, परंतु अंगे्रज लोग और सर स्टेफर्ड क्रिप्स तो सारी स्थितियों को अच्छी तरह जानते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह भली-भांति नहीं सोचा गया है कि वे प्रस्ताव, जो अब ब्रिटिश सरकार की ओर से आए हैं, वही हैं जिन्हें कुछ ही महीने पहले ब्रिटिश सरकार ने बिल्कुल व्यर्थ कहकर निंदा ही नहीं की वरन् अस्वीकार कर चुकी है। जिन्हें इसका अहसास है वे इन्हें संवैधानिक प्रगति का सबसे बदसूरत रूप ही कहेंगे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने पूर्व घोषणाओं के विपरीत अचानक बदल दिया है। प्रस्ताव तीन भागों में विभाजित किए जा सकते हैं। (1) एक संविधान सभा बनती है, जिसे भारत के लिए संविधान बनाने का अधिकार प्राप्त होगा। इस सभा को पूरा अधिकार होगा कि बहुमत से, जो निश्चित करे उसी के अनुसार संविधान बनेगा। (2) नया संविधान भारत के सभी वर्तमान प्रांतों के लिए नहीं होगा, बल्कि केवल ऐसे प्रांतों के लिए होगा, जो इसे अपनाना चाहेंगे। इसलिए प्रांतों को यह छूट दी गई है कि वे नए संविधान में शामिल हों अथवा उससे बाहर रहें। यह जनमतसंग्रह पर छोड़ दिया गया है, इससे साधारण बहुमत का फैसला मान्य होगा। (3) संविधान सभा को ब्रिटिश सरकार से एक संधि करनी पड़ेगी। संधि में प्रांतीय धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए प्रावधान किए जाने हैं। ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद ब्रिटिश सरकार की प्रभुसत्ता समाप्त हो जाएगी और संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान लागू हो जाएगा।