परिशिष्ट
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संक्षेप में ब्रिटिश सरकार की यह योजना है।
संविधान सभा के संबंध में किया गया प्रस्ताव नया प्रस्ताव नहीं है। विश्व युद्ध आरंभ होने पर ऐसा प्रस्ताव लाया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रिटिश सरकार ने कांगे्रस के उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। संविधान सभा के संबंध में हाउस ऑफ कामंस में 14 अगस्त, 1940 को लार्ड एमेरी ने कहा थाःµ
फ्कांगे्रस नेताओं ने एक अच्छे ढंग का संगठन बना लिया है, जिसमें भारत
के राजनीतिक तंत्र का संचालन करने की काफी क्षमता है। असल में भारत
के राष्ट्रीय जीवन में जैसाकि कांगे्रस सभी मुख्य तत्वों की ओर से बोलने
का दावा करती है और उन्होंने अलग से मांगें रखी हैं, इससे हमारी समस्याएं
बहुत बढ़ जाती हैं। यह सही है कि संख्या-बल से वह भारत की अकेली
सबसे बड़ी पार्टी है, परंतु भारत के मिले-जुले समाज में महत्वपूर्ण वर्गों
ने उसके दावों का खंडन किया है। केवल गिनती के आधार पर ही उन्हें
अल्पसंख्यक न माना जाए, वरन् भावी भारतीय राजनीति में उन्हें पृथक
संवैधानिक तत्व समझ कर विचार किया जाए। उन प्रमुख वर्गों में मुस्लिम
समुदाय सबसे बड़ा समुदाय है। उनका कहना है कि भौगोलिक दृष्टि से बने
निर्वाचन क्षेत्रों में बहुमत से निर्वाचित संविधान सभा द्वारा गठित संविधान से
सहमत नहीं होंगे। वे संविधान निर्माण संबंधी विचार-विमर्श में संख्या-बल
सिद्धांत पर सहमत नहीं हैं और अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने का दावा
करते हैं। यही बात दूसरे बड़े समुदाय अनुसूचित जातियों पर लागू होती हैं,
जो अनुभव करते हैं कि श्री गांधी प्रयत्नों के बावजूद हिंदुओं की प्रतिनिधि
कांगे्रस से अपने को अलग समझते हैं।
भारत के वायसराय द्वारा 8 अगस्त, 1940 को ब्रिटिश सरकार की ओर से अल्पसंख्यकों के लिए की गई निम्नलिखित घोषणा को और स्पष्ट करते हुए लार्ड एमेरी ने निम्नलिखित घोषणा जारी की थीःµ
फ्दो मुख्य मुद्दे उभर कर सामने आए हैं। इन दो मुद्दों पर ब्रिटिश सरकार ने
मुझे स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। पहला मुद्दा भावी संवैधानिक भारत
की शांति और कल्याण के लिए अपने वर्तमान उत्तरदायित्वों को ऐसी शासन
व्यवस्था का हस्तांतरित नहीं कर सकता, जिसमें भारत के राष्ट्रीय जीवन में
शक्तिशाली बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अस्वीकार किया
जा सके। ऐसी सरकार में वे तत्व अपने को सम्मिलित नहीं करेंगे।य्