परिशिष्ट
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यह बिल्कुल स्पष्ट है कि संविधान सभा का प्रस्ताव कांगे्रस का हृदय जीतने के विचार से लाया गया है जबकि पाकिस्तान का प्रस्ताव मुस्लिम लीग को खुश रखने वाला प्रस्ताव है। परंतु ये प्रस्ताव दलित वर्ग के विषय में क्या कहता है? संक्षेप में, इनके हाथों में हथकड़ी और पांवों में बेड़ी डाल कर उन्हें हिंदुओं को सौप दिया गया है। वे हिंदू उन्हें कुछ नहीं देंगे - रोटी के बदले पत्थर मारेंगे, क्योंकि संविधान सभा का गठन दलित वर्ग के साथ विश्वासघात के सिवाय और कुछ नहीं है। इसमें कुछ संदेह नहीं कि संविधान सभा में दलितों की क्या स्थिति होगी और संविधान सभा में राजनीतिक कार्यक्रम क्या होंगे? संविधान सभा में दलित का कुछ भी प्रतिनिधित्व नहीं होगा, क्योंकि इस प्रस्ताव में सांप्रदायिक कोटा निश्चित नहीं किया गया है। यदि उसमें हमारे कुछ प्रतिनिधि लिए भी जाते हैं, तो वे स्वतंत्र होंगे और न उनका स्वतंत्र निर्णायक मत होगा। पहली बात तो यह कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि वहां निस्सहाय अल्पसंयक के तौर पर होंगे। दूसरी बात यह कि संविधान सभा के सभी निर्णयों में सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं समझी जाएगी। किसी भी समस्या को हल करने के लिए बहुसंख्यक दल का बहुमत काफी है। उसका संवैधानिक महत्व कुछ भी हो इसका कोई महत्व नहीं। स्पष्ट है कि इस व्यवस्था से संविधान सभा में दलित वर्ग की कोई सुनवाई नहीं होगी। तीसरी बात यह कि ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव के आधार पर समानुपात की वर्तमान व्यवस्था, जिसके द्वारा संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव होना है। इसके आधार पर सवर्ण हिंदुओं का वास्तविक अधिकार होगा कि वे दलितों के प्रतिनिधियों को नामित करें। वे प्रतिनिधि सवर्ण हिंदुओं के पिट्ठू होंगे। चौथी बात यह कि संविधान सभा ऐसे कांगे्रसियों द्वारा भरी जाएगी, जो बहुमत से अपने कार्यक्रम लागू करेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री गांधी द्वारा दलितों के सामाजिक उत्थान के लिए किए गए प्रयत्नों के बारे में चाहे कुछ भी क्यों न कहा जाए, संविधान में दलितों के लिए भारत के राष्ट्रीय जीवन में पृथक अस्तित्व देने जैसे किसी भी प्रकार की राजनीतिक मान्यता देने के सर्वथा विरुद्ध है। ऐसा होने से संविधान सभा में बहुसंख्यक दल अपने बहुमत से अस्पृश्यों के उन सभी संरक्षणों पर पानी फेर देगा, जो उन्हें वर्तमान संविधान में प्राप्त है। जो भी व्यक्ति संविधान सभा की इन बातों को समझेगा वह यह स्वीकार करेगा कि ब्रिटिश सरकार के इन प्रस्तावों में दलित वर्ग के लोगों को भेडि़यों के सामने फेंक दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि संविधान सभा दलितों का संवैधानिक संरक्षण का अधिकार देने से इंकार करेगी, उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा में संधि की व्यवस्था रखी है उसका उद्देश्य दलितों के हितों का ध्यान रखना है। समझौते के इस प्रस्ताव से यह स्पष्ट नहीं होता कि संधि में ब्रिटिश सरकार ने किस प्रकार के संरक्षण को समझौते में शामिल करने का निश्चय किया है। यह महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि प्रस्ताव को