क्रिप्स प्रस्तावों का विरोध - Page 369

354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेकर ब्रिटिश सरकार और दलितों के बीच मतभेद हो सकते हैं कि नए संविधान में उनके संरक्षणों की क्या प्रकृति होगी, कितनी मात्रा और क्या उपाय होंगे? समझौते के विषय में दूसरा और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समझौते के पीछे कितनी बाध्यता होगी? क्या संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान एक अंग के रूप में होगा? जिसमें इस प्रकार का कोई प्रावधान होगा कि जो प्रावधान संधि के विरुद्ध होंगे, उन्हें रदद किया जा सके? क्या सह संधि दो सरकारों, भारतीय राष्ट्रीय सरकार और ब्रिटिश सरकार के मध्य केवल संधि समझी जाएगी? यदि समझौता उपरोक्त पहली शर्त के अनुसार होता है, तो वह देश के कानून के रूप में होगा और उस पर भारत सरकार की वैधानिक बाध्यता होगी। यदि यह संधि दूसरी शर्त पर होती है तो यह देश का कानून होगा। वह स्वीकृति राजनीतिक बाध्यता होगी। तब वह संधि राष्ट्रीय सरकार द्वारा निर्मित संविधान को ऐसे प्रावधान का उल्लंघन नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसी ही बात स्वतंत्र आयरिश के बारे में है, जो एक अधिराज्य नहीं है। इस संधि की बाध्यता राजनीतिक बाध्यता ही होगी। यह स्पष्ट है कि ऐसी बाध्यता का प्रयोग इस पर निर्भर करता है कि सरकार किस प्रकार की होगी और लोकमत कैसा होगा। इस तथ्य पर विचार करने से दो प्रश्न उठते हैंः (1) संधि की शर्तों को लागू करने के लिए ब्रिटिश सरकार के पास कौन से करार होंगे? (2) क्या ब्रिटिश सरकार अपने उन संसाधनों से भारतीय राष्ट्रीय सरकार को संधि से बांधे रख सकेगी? पहले प्रश्न का उत्तर यह है कि इसके दो उपाय होंगे, युद्ध या व्यापारिक युद्ध। जहां तक सैनिक शक्ति के साधन का प्रयोग करने की बात है, ब्रिटिश सरकार को तब भारतीय सेना उपलब्ध नहीं होगी। वह पूर्णतया भारतीय राष्ट्रीय सरकार को हस्तांतरित कर उसके नियंत्रण में कर दी जाएगी। इसलिए समझौते को लागू करने के लिए ब्रिटिश सरकार के पास यह साधन भी नही रह जाएगा। यह असंभव है कि ब्रिटिश सरकार समझौते को लागू करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय सरकार को विवश करने के लिए अपनी सेना भेजेगी। व्यापार युद्ध छेड़ना संभव नहीं है। यह आत्मघाती नीति है और आयरिश फ्री स्टेट के साथ भूसंपत्ति की वसूली को लेकर हुई लड़ाई के अनुभव से स्पष्ट है कि वणिकों का देश इस पर अपनी स्वीकृति नहीं दे सकता, चाहे वह उन्हीं के हित में क्यों न हो? इसलिए संधि एक बेजान फार्मूला बन जाएगी। ब्रिटिश सरकार ने ये प्रस्ताव यह समझ कर भेजे हैं कि भारतवासी इन प्रस्तावों का स्वागत करेंगे। परंतु न तो ब्रिटिश सरकार और न सर स्टैफार्ड क्रिप्स के पास इसका स्पष्टीकरण है कि वे इस प्रकार के प्रस्ताव को क्यों भेज रहे हैं, जिनकी भर्त्सना करते हुए कुछ ही महीने पहले उन्होंने रद्द कर दिया था। एक वर्ष पहले ब्रिटिश सरकार ने कहा था कि वे संविधान सभा की स्वीकृति नहीं देंगे क्योंकि वे अल्पसंख्यकों के लिए पीड़ादायक होगी। अब वही ब्रिटिश सरकार अल्पसंख्यकों को दबाने और संविधान