356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इन प्रस्तावों की मंशा है कि भारत में गृह युद्ध छिड़े, जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख और दलित लोग दिल खोल कर भाग लें। फिर भी सर स्टैफोर्ड क्रिप्स ने ब्रिटिश सरकार से राय ली अथवा बिना राय लिए बहुसंख्यक दलों तथा अल्पसंख्यक दलों में इस प्रकार का मतभेद उत्पन्न कर दिया है। बहुसंख्यक दल वे हैं, जिनकी सलाह लेना आवश्यक है। अल्पसंख्यक दल वे हैं, जिनकी सलाह के अवसर समाप्त कर दिए गए। यह नया पक्षपात है। अभी तक किसी पूर्व घोषणा में ब्रिटिश सरकार अथवा वायसराय ने ऐसा नहीं किया। अब तक की घोषणाओं में यही कहा गया था कि राष्ट्रीय जीवन में प्रमुख दलों की सलाह ली जाए।
जहां तक दलित वर्गों का संबंध है, मुझे नहीं मालूम कि किसी भी घोषणा में दलित वर्ग को मुसलमानों की अपेक्षा निचला दर्जा दिया गया हो। उदाहरणार्थ मैं वायसराय द्वारा 10 जनवरी, 1941 को बम्बई में दिए गए भाषण से निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत करता हूं, जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि दलितवर्ग और मुसलमानों को एक-सा दर्जा दिया गया हैः
फ्अल्पसंख्यकों के दावे बराबर जारी हैं। उनमें से मुझे केवल दो अल्पसंख्यक
दलों का उल्लेख करना है। वे दो बड़े अल्पसंख्यक हैं, मुसलमान और
अनुसूचित जातियों के लोग - अल्पसंख्यकों को पहले भी गारंटियां दी जा
चुकी हैं, सही बात तो यह कि उनकी सुरक्षा की गारंटी दी जाए और उन
गारंटियों को बनाए रखा जाए।य्
यह द्वेषात्मक पक्षपातमूलक प्रस्ताव, जो अब लाया गया उन अल्पसंख्यकों के साथ विश्वासघात का द्योतक है, जिनकी स्थिति इस पक्षपात से निचले दर्जे की हो गई है। संवैधानिक दृष्टि से इससे देश में शासन के प्रति अलगाव और बेवफाई फैलना अवश्यंभावी है। अब ब्रिटिश सरकार को इस पर विचार करना है कि इस प्रयत्न से उन लोगों की मित्रता पर विजय पाना है, जो पहले से ही किसी के हो चुके हैं। ऐसा करके वे अपने वास्तविक मित्रों को खो देंगे। इन प्रस्तावों से ब्रिटिश सरकार तोताचश्म दिखाई पड़ती है। जिन प्रस्तावों की वह निंदा कर चुकी है और उन्हें अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए आक्रामक बना चुकी है, अब उन्हीं को पेश करना यह प्रकट करता है कि उसने शक्तिसंपन्न के आगे घुटने टेक दिए हैं। यह म्यूनिक भावना है जिसका भावार्थ है अपने बचाव में दूसरे की बलि दे देना। यदि ब्रिटिश सरकार सत्य और न्याय के लिए नहीं लड़ सकती और अपने वचन का पालन नहीं कर सकती, तो अधिक अच्छा होगा कि चुप लगा जाएं। इससे कम से कम वे अपना सम्मान तो बचा लेंगे।