परिशिष्ट
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इस व्यवस्था के अनुसार वायसराय की काउंसिल के लिए जो सदस्य चुने जायेंगे, वे जापान के विरुद्ध छिड़े युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए निस्संदेह खुले दिल से सहयोग करेगे।
वायसराय तथा कमांडर-इन-चीफ के अतिरिक्त एक्जीक्यूटिव के सभी सदस्य भारतीय होंगे। यह उस समय तक नितांत आवश्यक है, जब तक कि भारत की सुरक्षा की जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार पर है।
इन प्रस्तावों में जो कुछ कहा गया है भारतीय राज्यों और ब्रिटिश सरकार के संबंधों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
ब्रिटिश सरकार की ओर से इन प्रस्तावों को भारतीय नेताओं के सामने रखने के लिए वायसराय को अधिकृत किया गया है। ब्रिटिश सरकार को विश्वास है कि भारतीय नेतागण इससे सहमत होंगे। इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है भारत में लोग इसे कितना स्वीकार करते हैं और अंतरिम व्यवस्था के उद्देश्य की प्राप्ति में भारतीय राजनीतिक नेतागण किस हद तक सहयोग करते हैं। जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं हो जाती, वर्तमान व्यवस्था को चालू रखना ही ठीक होगा।
यदि इस प्रकार का सहयोग केन्द्र में मिल जाता है, निस्संदेह उसका प्रभाव प्रांतों पर भी पड़ेगा, जिससे उन प्रांतों में फिर से उत्तरदायी सरकार बनाने में मदद मिलेगी, जिनमें बहुसंख्यक दल द्वारा समर्थन वापस ले लेने से अधिनियम 1935 की धारा 93 के अंतर्गत गवर्नरों ने सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। यह आशा की जाती है कि सभी प्रांतों में सरकारें प्रमुख दलों के सहयोग पर आधारित होंगी, जिससे साम्प्रदायिक भेदभाव दूर होंगे ओर मंत्रीगण प्रशासन पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
यदि ये प्रस्ताव मान लिये जाते हैं, तो आगे चलकर ब्रिटिश सरकार केवल एक यह परिवर्तन लायेगी।
वह यह कि (जनजातीय क्षेत्र एवं सीमांत के मामलों को जहां पर भारत की सुरक्षा का प्रश्न है, उसके अतिरिक्त) जहां तक ब्रिटिश इंडिया का सम्बन्ध है, वायसराय की कार्यकारिणी के भारतीय सदस्यों के हाथों में विदेशी मामले सौंप दिये जायेंगे और देश के बाहर भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने के लिए विश्वासपात्र प्रतिनिधि नियुक्त किये जायेंगे।
इस योजना में भारतीय नेताओं की स्वीकृति एवं सहयोग से उन भारतीयों को तुरन्त भारतीय मामलों की दिशा में केवल योगदान करने का अवसर ही न मिलेगा वरन् यह भी आशा की जाती है कि सरकार में उनके सहयोग के अनुभव से नवीन संविधान की संरचना का मार्ग प्रशस्त करने में उनमें पारस्परिक सहमति भी हो सकेगी।