परिशिष्ट
393
ब्रिटिश सरकार का एक और प्रस्ताव है वह यह कि भारत में अन्य उपनिवेशों के समान ब्रिटिश हाई कमिश्नर नियुक्त किया जाये, जो भारत में गे्रट ब्रिटेन के व्यापारिक एवं अन्य हितों के लिए प्रतिनिधि के रूप में कार्य करें।
आप देखेंगे कि इस नई गठित एक्जीक्यूटिव काउंसिल से स्वायत्त शासन का मार्ग प्रशस्त होगा। वह काउंसिल अधिकांश रूप में भारतीय होगी और वह पहला अवसर है कि वित्त एवं गृह सदस्य अब भारतीय होंगे और अब तो भारत के विदेशी मामलों का प्रबंध भी भारतीयों के हाथ में होगा। गवर्नर जनरल अब राजनीतिक नेताओं के परामर्श से सदस्यों का चुनाव करेंगे, तथापि उनकी नियुक्ति पर ब्रिटिश सम्राट की स्वीकृति अवश्य ली जायेगी।
वह काउंसिल वर्तमान संविधान के अंतर्गत कार्य करेगी और गवर्नर जनरल के अपने संवैधानिक नियंत्रक अधिकार के क्रियान्वयन पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा, परन्तु अनावश्यक रूप से ऐसे अधिकार का क्रियान्वयन नहीं किया जायेगा।
मैं यह स्पष्ट कर देता हूं कि इस अंतरिम सरकार के गठन से अंतिम रूप से संवैधानिक समझौता नहीं हो जायेगा।
इस नई एक्जीक्यूटिव काउंसिल के ये मुख्य कार्य होंगेःµ
प्रथम तो यह कि जापान के साथ छिड़े युद्ध का पूरी शक्ति के साथ सामना कर उसे पूर्णतया पराजित करना।
दूसरे, यह कि युद्ध समाप्ति के बाद सभी दिशाओं में प्रगति करने के लिए ब्रिटिश सरकार को उस समय तक चलते रहने दिया जाये, जब तक कि नया स्थायी संविधान सर्वसम्मति से लागू नहीं कर दिया जाता।
तीसरे, यह कि सरकार के सदस्यों को यह विचार करना संभव होगा कि ऐसी सामान्य सहमति के प्राप्त करने का क्या रास्ता निकाला जाये।
यह तीसरी समस्या बहुत महत्वपूर्ण है। मैं इसे पूर्णतया स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि न तो मैंने और न ब्रिटिश सरकार ने लम्बी अवधि के हल की अनदेखी कर दी है ये वर्तमान प्रस्ताव लम्बी अवधि के हल को और आसान कर देंगे।
मैंने ऐसी काउंसिल का गठन करने के लिए अच्छे तरीके सोच रखे हैं और वायसराय लॉज ने इसके लिए मुझे परामर्श देने के लिए निम्नलिखित को निमंत्रण देने को मैंने निश्चय किया है।
वे लोग जो इस समय प्रांतीय सरकारों में प्रधानमंत्री हैं अथवा धारा 93 के अंतर्गत अब प्रांतों में प्रधानमंत्री के पद पर हैं।