2. तुच्छ प्रदर्शन - Page 41

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं करना चाहती थी बल्कि इसलिए कि उसने महसूस किया कि स्वामी श्रद्धानंद को समिति में रखकर उसने भूल की? ख्1, कांग्रेस ने पहले तो स्वामी जी को संयोजक बनाने से इन्कार किया और बाद में समिति को भंग कर अस्पृश्योत्थान का काम हिंदू महासभ को सौंप देना बेहतर समझा। ऐसे परिणाम पर पहुंचने के लिए परिस्थितियां प्रतिकूल नहीं थीं। स्वामी जी अस्पृश्यों के बहुत बड़े और सत्यनिष्ठ शुभचिंतक थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि स्वामी जी उस समिति में होते तो अस्पृश्योत्थान की एक बहुत बड़ी योजना प्रस्तुत करते। इसीलिए कांग्रेस उन्हें उस समिति में नहीं रहने देना चाहती थी क्योंकि उसे डर था कि स्वामी जी अस्पृश्यों के हित में कांग्रेस कोष से बड़ी धनराशि की मांग करेंगे। यह बात उस पत्रव्यवहार ख्2, से और अधिक स्पष्ट है जो कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव श्री मोतीलाल नेहरू तथा स्वामी जी के बीच हुआ था जो परिशिष्ट में छपा है। यदि यह निष्कर्ष सही है तो इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस, जिसने अस्पृश्योत्थान का प्रस्ताव पास किया था, के शब्द कितने अविश्वसनीय थे।

क्या कांग्रेस ने यह योजना इसलिए ताक पर रख दी कि वह क्रांतिकारी कार्यक्रम था? प्रस्ताव किसी भी दशा में क्रांतिकारी नहीं था। यह बात कार्य समिति की इस टिप्पणी से परिलक्षित हो जाती है जो उसने अपने प्रस्ताव के साथ संलग्न की थी और जिसे कांग्रेस महासमिति ने स्वीकार किया था। यह टिप्पणी इस प्रकार थी -

फ्बहरहाल जहां अस्पृश्यों के प्रति भेदभाव बरता जाता है वहां कांग्रेस कोष से

उनके लिए पृथक स्कूल तथा पृथक कुओं की व्यवस्था की जाए। साथ-साथ

उनके बच्चों को राष्ट्रीय स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजने के भरसक प्रयत्न

किए जाएं तथा लोगों को समझाया जाए कि वे अस्पृश्यों को सार्वजनिक

कुओं से पानी लेने दें।य्

इस टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अस्पृश्यता को समान्त नहीं करना चाहती थी। उसने पृथक स्कूलों तथा पृथक कुओं की व्यवस्था की नीति अपनाई। कांग्रेस ने अस्पृश्योत्थान का प्रस्ताव पास करने के अलावा कुछ नहीं किया और कांग्रेस ऐसे भीरू - साधारण तथा न्यूनतम कार्यक्रम को भी लागू नहीं कर पाई और उसने अत्यंत निर्लज्जता और पश्चाताप के साथ इस कार्यक्रम को त्याग दिया।

  1. यह तथ्य कि कांग्रेस श्री देशपांडे को संयोजक बनाना चाहती थी इस बात को स्पष्ट करता है कि वह

स्वामी जी के हाथों में उस काम को रखना पसंद नहीं करती थी। श्री देशपांडे का संयोजक के रूप

में चयन इस बात का साक्ष्य है कि वे इस मामले में कोई काम नहीं होने देना चाहते थे क्योंकि श्री

देशपांडे कट्टठ्ठर ब्राह्मण थे जिन्होंने अस्पृश्यों के कल्याण कार्य में कोई रुचि नहीं दिखाई। (विस्तार के

लिए देखें परिशिष्ट संख्या - एक)

  1. परिशिष्ट - एक