396 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आजम जिन्ना के साथ वार्तालाप के लिए गया था और अब ब्रिटिश सरकार से बात करने के लिए मैं अन्य कोई स्थिति नहीं स्वीकार कर सकता।
वायसराय की घोषणा का एक पहलू मेरे मन में खटकता है और मैं समझता हूं कि प्रत्येक राजनीतिक हिंदू को यह बात खटकेगी। मैं सवर्ण हिंदू के संदर्भ से कहना चाहता हूं। मेरा दावा है कि राजनीतिक अर्थों में कोई भी आदमी सवर्ण हिंदू नहीं है। कांगे्रस को ही लीजिए, जो भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई में सारे देश का प्रतिनिधित्व करती रही है, उसने अपने को ‘‘कास्ट हिंदू’’ नहीं कहा। वीर सावरकर अथवा डाक्टर श्यामा प्रसाद मुकर्जी जो हिंदू महासभा से संबंधित हैं, सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या बिना जाति-पांति का भेदभाव किये, वे सभी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं? क्या वे हिंदुओं में अस्पृश्यों को शामिल नहीं मानते? क्या वे स्वयं अपने आप को सवर्ण हिंदू होने का दावा करते हैं। मैं आशा करता हूं कि ऐसी बात नहीं। समस्त राजनीतिक हिंदू यहां तक कि आदरणीय पंडित मदन मोहन मालवीय भी जो जातीय भेद में विश्वास करते हैं, वह भी अपने आपको सवर्ण हिंदू कहना स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि इससे अन्य हिंदुओं के अलगाव की झलक दिखाई पड़ती है। हिंदू धर्म में आधुनिक विचारधारा सभी जातीय भेदभावों को समाप्त करने की है और हिंदू समाज में इस प्रकार के प्रतिक्रिया वादी हैं। इसलिए मैं केवल यही आशा कर सकता हूं कि वायसराय ने पूर्णतया नासमझी में इन शब्दों का प्रयोग किया है। मैंने उन्हें इस विचार से दोष मुक्त करता हूं कि सभी हिंदू समाज की ग्राहयता नहीं समझते। मैं इस बात पर इतना अधिक ध्यान न देता, परन्तु वास्तव में ध्यान इसीलिए दिया कि वायसराय का ऐसा शब्द प्रयोग राजनीतिक हिंदू मस्तिष्क के सचेतन स्थान पर प्रहार करता है। प्रस्तावित सभा से बहुत लाभप्रद कार्य हो सकते हैं, बशर्ते कि राजनीतिक तोड़-फोड़ की भावना से मुक्त हों। निस्संदेह सभी आमंत्रित महानुभाव संयुक्त रूप से भारत के वांछित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करेंगे न कि भारतीय समाज के अनेक वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में।
इसीलिए मैंने भूलाभाई-लियाकत अली समझौते को देख लिया है जिसके विषय में मैं समझता हूं कि यह वायसराय सम्मेलन का आधार है। श्री भूलाभाई देसाई के प्रस्तावों में ऐसी झलक नहीं है जो वायसराय के प्रसारण में मौजूद थी। मुझे इसमें कोई संकोच नहीं जो भूमिका मैंने श्री भूलाभाई देसाई को सलाह देकर निभाई, जब उन्होंने मुझसे परामर्श किया था। जैसा कि मैं समझता हूं श्री भूलाभाई देसाई के प्रस्ताव ने मुझे प्रभावित किया कि वह साम्प्रदायिक टकराव रोकने की दिशा में है और मैंने