2. तुच्छ प्रदर्शन - Page 56

तुच्छ प्रदर्शन

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से कंधा मिलाकर चलें। 20 अक्तूबर, 1920 के फ्यंग इंडियाय् में प्रकाशित श्री गांधी ने अस्पृश्यों को इस प्रकार संबोधित किया µ

फ्देश के पद-दलितों के सामने तीन विकल्प हैं। वे अपनी जल्दबाजी में गुलाम बनाने वाली सरकार की सहायता कर सकते हैं। ऐसा करने से उनका उसी प्रकार पतन होगा जैसे कोई वस्तु कड़ाही से निकाल कर आग में गिराई जाए। आज अस्पृश्य गुलामों के गुलाम हैं। सरकार की सहायता प्राप्त करने के बाद वे अपने ही लोगों को दबाने के लिए सरकार के साधन बनेंगे। कलंक को धोने के बजाए वे स्वयं कलंकी बन जाएंगे। मुसलमानों ने इस दिशा में कुछ प्रयत्न किया परंतु असफल रहे। उन्हें महसूस हुआ कि वे पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शोचनीय स्थिति में हैं। सिखों ने भी अज्ञानता में ऐसा ही किया और वे भी असफल रहे। आज भारत में सिखों से अधिक असंतुष्ट कौम और कोई नहीं है। इसलिए सरकारी सहायता इस समस्या का कोई हल नहीं है।य्

दूसरा विकल्प हिंदू धर्म का त्याग और इस्लाम अथवा ईसाई धर्म को बड़े पैमाने पर ग्रहण करना है। यदि सांसारिक सुखों के लिए धर्म-परिवर्तन उचित माना जाए तो इसके लिए मैं बिना हिचकिचाहट इसकी सलाह दूंगा परंतु धर्म हृदय से मानने की बात है। भौतिक असुविधा किसी को अपना धर्म त्यागने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यदि पंचम वर्ण के साथ अमानुषिक बर्ताव करना हिंदू धर्म का अभिन्न अंग है तो उस हिंदू धर्म को त्यागना पंचम वर्ण तथा मेरे जैसे उन सभी लोगों का परम कर्तव्य होगा जो धर्म को अंधविश्वास नहीं बनाएंगे और इसके पवित्र नाम पर हर बुराई की अनदेखी नहीं करेंगे। परंतु मुझे विश्वास है कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग नहीं है। अस्पृश्यता एक कलंक है जिसका निराकरण सभी संभव तरीकों से किया जाना चाहिए। हिंदू धर्म-सुधारकों की संख्या काफी अधिक है जो हिंदू धर्म के इस कलंक के धब्बे को मिटाने के लिए कटिबद्ध हैं। अतः मैं समझता हूं कि धर्म-परिवर्तन इसका हल नहीं है।

अंत में स्वसहायता तथा स्वावलंबन है जिसके लिए सवर्ण हिंदुओं को अपने हृदय से सहायता करनी चाहिए न कि उसे एक कर्तव्य मानकर। इसके बाद असहयोग की बात आती है। इसलिए हिंदू धर्म के विरुद्ध आंदोलन छेड़कर पंचम वर्ण के लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सवर्ण हिंदुओं से समस्त संबंध तोड़ सकते हैं। परंतु इनके लिए सुसंगठित बुद्धिमत्तापूर्ण