तुच्छ चालें
47
शर्त संख्या - 1
समान नागरिकता
वर्तमान परिस्थिति में दलित वर्ग सदा गुलाम बनाए रखने वाले बहुमत के शासन का समर्थन नहीं कर सकता। बहुमत का शासन स्थापित होने से पहले अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए। यह बहुमत की इच्छा पर नहीं छोड़ना चाहिए। दलित वर्गों के लोगों को स्वतंत्र नागरिकों के वे सभी अधिकार मिलने चाहिएं जो साधारणतया स्वतंत्र देश के सभी नागरिकों को प्राप्त हैं।
(क) अस्पृश्यता उन्मूलन तथा समान नागरिकता की स्थापना सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित मौलिक अधिकारों को भारत के संविधान का अंग बनाने का प्रस्ताव हैःµ
मूल अधिकार
भारत में राज्य के सभी व्यक्ति कानूनी रूप से एक समान हों और उन्हें समान
संयुक्त राज्य अमरीका नागरिक अधिकार प्राप्त हों। कोई वर्तमान अधिनियमन,
संविधान संशोधन 14 विनियमन, आदेश, रूढि़ या विधि की व्याख्या - जिसके द्व
तथा आयरलैंड सरकार ारा अस्पृश्यता के आधार पर किसी प्रकार का दंड असुविधा,
अधिनियम 1920 10 तथा अयोग्यता, आरोपित की जाती है अथवा राज्य के किसी
67, धारा 5(2)11 जि.यो. V अध्याय नागरिक से किसी प्रकार का भेदभाव किया जाता है,
वह उस दिन से समाप्त हो जाएगा, जब से भारत का संविधान लागू होगा।
(ख) भारत सरकार के अधिनियम, 1919 की धारा 110 तथा 111 के अंतर्गत,
सभी संविधानों में ऐसी स्थिति है देखें - प्रो. कीथ की टिप्पणी, सी. एम.डी. 207, पृष्ठ 56
जो छूट और सुविधाएं कार्यपालिका को अब प्राप्त हैं, उन्हें समाप्त करना तथा कार्यपालिका के कृत्यों में उनके उत्तरदायित्व को यूरोपियन ब्रिटिश नागरिक के उत्तरदायित्व के समान बनाना।
शर्त संख्या - 2
समान अधिकारों का अबाध उपयोग
दलित वर्गों के लिए अधिकारों की घोषणा मात्र से कोई लाभ नहीं होगा। यदि दलित वर्ग समान नागरिक अधिकारों का उपयोग करेंगे तो निस्संदेह उन्हें रूढि़वादी पूरे हिंदू समाज को प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। इसलिए दलित वर्ग के लोग यह अनुभव