48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करते हैं कि अधिकारों की ऐसी घोषणाएं केवल घोषणाएं बनकर ही न रह जाएं बल्कि दैनिक व्यवहार में आनी चिहएं। उन घोषित अधिकारों के प्रयोग में उठने वाली बाधाओं का सामना करने के लिए उचित दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(क) अतः दलित वर्ग यह प्रस्ताव करता है कि 1919 के भारत सरकार के अधिनियम के भाग 11 में अपराध, प्रक्रिया ओर दंड का प्रावधान करने वाली निम्नलिखित धारा जोड़ी जाएःµ
(1) नागरिकता के नियम का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान
यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को कानून के अलावा अस्पृश्यता के आधार
पर आवास, लाभ, सुविधाओं का उपभोग करने, सरायों
अमरीका में नीग्रो लोगों में ठहरने, शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश करने, सड़कों पर
की स्वतंत्रता के बाद चलने, तालाबों और पानी भरने के अन्य स्थानों, कुओं का
उनके हितों की सुरक्षा के लिए पास किए गए अप्रैल, 1866 तथा 1 मार्च, 1875 के सिविल प्रयोग करने, सड़क मार्ग या जल मार्गों के आवागमन के साधनों का उपयोग करने, सिनेमाघरों, लोक मनोरंजन के स्थानों जिनका प्रयोग सार्वजनिक रूप से होता हो, पर जाने
राइट्स प्रोटेक्शन एक्ट्स। से रोकेगा तो वह दंड का भागी होगा, जिसे, अपराध के अनुसार, अधिक से अधिक पांच वर्ष का कारावास हो सकता है और जुर्माना भी हो सकता है।
(ख) दलित वर्गों द्वारा अपने अधिकारों के शांतिपूर्वक उपभोग करने में हिंदू केवल बाधाएं ही नहीं डालते। उनका सबसे अधिक प्रचलित तरीका सामाजिक बहिष्कार है। यदि दलित वर्गों के अधिकार कट्टठ्ठर हिंदुओं को नहीं पचते हैं, तो सामाजिक बहिष्कार उनका अचूक शस्त्र है। सामाजिक बहिष्कार किस प्रकार और किन अवसरों पर किया जाता है उसका वर्णन बम्बई सरकार द्वारा वर्ष 1928 में गठित एक समिति की रिपोर्ट में विस्तार से किया गया है। बम्बई प्रेसीडेंसी में दलित वर्गों के बारे में जांच करने और उनके उत्थान के उपायों का सुझाव देने के लिए इस समिति का गठन किया गया था। इसकी सिफारिशों के कुछ अंश निम्न प्रकार हैंःµ
दलित वर्ग तथा उसका सामाजिक बहिष्कार
फ्102 - यद्यपि सभी सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करने के अधिकार दलित वर्गों को दिलाने के लिए हमने विभिन्न प्रकार के उपचार सुझाए हैं, तथापि हमें डर है कि उन वर्गों को उन अधिकारों का उपयोग करने में भविष्य में बहुत सी