तुच्छ चालें
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कठिनाइयों का सामना करना होगा। पहली कठिनाई कट्टठ्ठर हिंदुओं द्वारा दलित वर्गों पर
खुलेआम हिंसा बरपाने की है। यह ध्यान देने की बात ळै कि गांवों में दलित वर्गों की संख्या बहुत कम होती है जबकि कट्टठ्ठर हिंदू बहुत अधिक संख्या में होते हैं, जो हर कीमत पर दलितों से अपने स्वार्थों और हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं। दलित वर्गों पर कट्टठ्ठर हिंदुओं की हिंसा पुलिस की कार्यवाही के भय से कम हो गई है और परिणामस्वरूप ऐसे बहुत कम मामले प्रकाश में आते हैं।
फ्दलित वर्गों में आजकल भयानक आर्थिक समस्याएं हैं। प्रेसीडेंसी के अधिकतर भागों में दलित वर्ग के लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ रूढि़वादी हिंदुओं के खेत जोतते-बोते हैं, तो कुछ उनके यहां मजदूरों के तौर पर काम करते हैं। अन्य बहुत से लोग रूढि़वादी हिंदुओं के खेतिहर मजदूर बनकर अपनी जीविका चलाते हैं और कुछ अस्पृश्यों को उन हिंदुओं के यहां नौकरी करके जो अनाज मिलता है उसी से गुजर-बसर करते हैं। बहुत से उदाहरण सुनने में आए हैं, जाहं पर सनातनी हिंदुओं ने अपनी आर्थिक स्थिति को अपने गांवों के दलितों को दबाने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग किया। जब दलितों ने अपने प्राप्त अधिकारों का उपयोग करना चाहा तो कट्टठ्ठर हिंदुओं ने उनसे खेत छीन लिए, उनको काम से हटा दिया और गांवों में जहां उन्हें काम मिलता था उस काम से वंचित कर दिया गया। इस प्रकार उनके बहिष्कार की योजना इस हद तक बनाई जाती है कि उन्हें सार्वजनिक मार्गों पर चलने भी नहीं दिया जाता। गांव के बनिए से जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुएं खरीदने के बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है। प्रायः दलितों को सामान्य कुओं से पानी नहीं लेने दिया जाता। ऐसी बातें भी सामने आई हैं कि कुछ दलितों के जनेऊ धारण कर लेने पर, कुछ भूमि खरीद लेने पर, कुछ साफ कपड़े और गहने पहन लेने पर सार्वजनिक मार्ग से दूल्हे को घोड़े पर चढ़ाकर बारात में ले जाने पर पूरी तरह रोक लगी होती है।
फ्हम नहीं समझते कि अस्पृश्यों को कुचलने के लिए इस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार से बढ़कर कोई और हथियार हो सकता है। लाठी डंडा चलाने की बात भी इसके सामने कुछ नहीं बचती, क्योंकि सामाजिक बहिष्कार बहुत ही भयंकर हथियार है। यह और भी घातक है, क्योंकि यह घुलमिल कर रहने की स्वतंत्रता के सिद्धांत पर ही वार करता है। हम इस बात से सहमत हैं कि बहुसंख्यकों के इस प्रकार के अत्याचार की वारदातें बहुत सख्ती के साथ दबाई जाएं, यदि हम दलितों के बोलने की स्वतंत्रता और उनके उत्थान की आवश्श्यकता समझते हैं तो हमें इसकी गारंटी देनी होगी।य्