50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दलित वर्ग के विचार से उनकी स्वतंत्रता तथा अधिकारों पर कुठाराघात करने वाली मुसीबतों से छुटकारा दिलाने का केवल एक ही उपाय है कि सामाजिक बहिष्कार कानूनी रूप से दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। इसलिए दलित वर्ग के लोग भारतीय संविधान के 1919 के भाग 11 में यह जोड़ने पर जोर देते हैं कि सामाजिक बहिष्कार पर दंड की व्यवस्था अवश्य की जाए।
1. बहिष्कार के अपराध को परिभाषित करना
(1) इसे बहिष्कार माना जाए जब कोई मनुष्य दूसरे कोः
(क) किसी भी घर में नहीं रहने देता, भूमि पर कब्जा लेने से रोकता है, बेगार
यह और निम्नलिखित विधिक उपबंध कराता है, किसी मनुष्य को व्यापार करने में बाधा
बर्मा ऐंटी बायकाट एक्ट, 1922 से लेकर मामले की आवश्यकतानुसार कुछ आवश्यक परिवर्तन के साथ उद्धृत किए गए हैं। डालता है या किसी से दासता कराता है अथवा उन्हें उक्त सार्वजनिक कार्यों में से किसी को करने से रोकता है, अथवाµ
(ख) सामाजिक और व्यावसायिक अथवा व्यापारिक कार्यों में रोक लगाकर ऐसे रिवाज थोपता है जो संविधान में घोषित नागरिकता संबंधी मूल अधिकारों के विपरीत हैं।
(ग) किसी भी प्रकार से आघात पहुंचाता है, किसी प्रकार के कष्ट देता है, अथवा संविधान प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करने में कोई बाधा उत्पन्न करता है।
2. बहिष्कार करने पर सजा
यदि कोई किसी को संविधानसम्मत कार्य करने से रोकता है और बरबस वह कार्य कराता है, जिन्हें कानूनन वर्जित कर दिया गया है, कोई व्यक्ति जबरदस्ती किसी से वह कार्य कराना चाहता है, जिसके लिए वह वैधानिक रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता, अथवा कोई किसी के कानूनसम्मत कार्य कराने पर उसके शारीरिक, मानसिक, मानमर्यादा, संपत्तिहरण का इरादा रखता है, उसके व्यापार अथवा जीविकोपार्जन से वंचित करता है, तो ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाएगा। दोनों मामलों की गंभीरता को देखकर सात वर्ष की सजा अथवा जुर्माना अथवा दोनों ही किया जा सकता है।
न्यायालय यदि इस बात से संतुष्ट है कि अभियुक्त ने किसी के भड़काने पर अथवा किसी साजिश के तहत अपराध नहीं किया है अथवा सामूहिक रूप से बहिष्कार करने में शामिल नहीं है, तो उपरोक्त धारा के अंतर्गत कोई कार्य अपराध की सीमा में नहीं आता।