3. तुच्छ चालें - Page 68

तुच्छ चालें

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(1) प्रांतीय तथा केंद्रीय विधायिका में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए।

(2) उनको अपने ही वर्ग से प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया जाए जिसके लिए µ

(क) वयस्क मताधिकार, और

(ख) प्रथम दस वर्षों के लिए पृथक मतदान द्वारा और उसके बाद संयुक्त

चुनाव प्रणाली द्वारा उनके लिए सुरक्षित सीटों पर चुनाव का प्रसवधान हो।

यह भी जरूरी है कि संयुक्त चुनाव प्रणाली उन पर जबरदस्ती उनकी इच्छा

के विरुद्ध तब तक नहीं थोपी जाए, जब तक संयुक्त चुनाव प्रणाली में पूर्ण

वयस्क मताधिकार का विधान न हो।

टिप्पणी µ दलित वर्गों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व तब तक नहीं समझा जा सकता, जब तक कि अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व परिभाषित न हो। परंतु यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि दलित वर्ग इसे स्वीकार नहीं करेंगे कि किसी अन्य समुदाय के प्रतिनिधित्व को उनसे बेहतर सुविधाएं दे दी जाएं। इस दिशा में दलित वर्ग के लोग किसी प्रकार की अलाभकारी स्थिति में रहना पसंद नहीं करेंगे। किसी भी हालत में बम्बई और मद्रास के दलित वर्ग अपनी जनसंख्या के आधार पर अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए विशेष स्थान चाहेंगे, भले ही अन्य समुदायों को उन प्रांतों में कितना ही प्रतिनिधित्व मिले।

शर्त संख्या µ 5

नौकरियों में यथोचित प्रतिनिधित्व

सरकारी नौकरियों पर सवर्णों ने एकाधिकार जमा रखा है। इस कारण दलित वर्गों की भारी उपेक्षा हो रही है। सवर्ण लोगों ने न्याय और समानता को धता बताकर सवर्ण हिंदुओं को लाभ पहुंचाने के लिए कानून की अनदेखी कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है। सरकारी नौकरियों में सवर्ण हिंदुओं के एकाधिकार को समाप्त करने और इस प्रकार का नियम बनाने की जरूरत है कि नौकरी में भरर्ती इस प्रकार की जाए, जिससे सभी संप्रदायों को उनका उचित भाग मिले। तभी हिंदुओं की चालाकी से बचा जा सकता है। इसके लिए दलित वर्गों को संवैधानिक विधि के अंग के रूप में सांविधिक व्यवस्था करने के लिए निम्नलिखित प्रस्ताव करने हैं µ

(1) भारत में तथा प्रत्येक प्रांत में सरकारी नौकरियों में भर्ती करने के लिए तथा नौकरियों पर नियंत्रण रखने के लिए एक लोक सेवा आयोग होगा।