तुच्छ चालें
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(3) ऐसे प्रत्येक मामले में जहां गवर्नर जनरल अथवा सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को यह प्रतीत हो कि प्रांतीय अथवा केंद्रीय सरकारें इस प्रावधान को लागू करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठातीं, तब ऐसे प्रत्येक मामले में गवर्नर जनरल तथा भारत सरकार अपील सुनने वाले प्राधिकरण होने के नाते इस प्रावधान के पालन के लिए कुछ समय निर्धारित करें और प्रांतीय और केंद्रीय सरकार इस विषय में उनको मानने को बाध्य हों।
शर्त संख्या µ 7
विशेष विभागीय सुरक्षा
बेबस, बेसहारा और बेकस दलितों की दुर्दशा का मुख्य कारण समस्त हिंदुओं की हठधर्मी है, जिसने कभी दलित वर्ग को बराबरी का स्थान नहीं दिया और न ही समानता का व्यवहार किया। उनकी आर्थिक स्थिति के विषय में केवल इतना ही कहना पर्याप्त नहीं है कि वे गरीबी के मारे हुए हैं अथवा वे भूमिहीन मजदूर वर्ग से हैं। वैसे तो ये दोनों बातें सही हैं तब भी यह ध्यान देने की बात है कि दलित वर्गों की गरीबी की जड़ अधकिंश रूप से सामाजिक पूर्वाग्रह हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे जीविकोपार्जन के सभी साधनों से वंचित हैं। यह एक सत्य है, जो दलित वर्गों तथा साधारण सवर्ण हिंदू मजदूरों के बीच अंतर पैदा करता है और प्राय उनकी मुसीबतों की जड़ है। यह भी ध्यान देने की बात है कि दलितों के उत्पीड़न तथा उनके दमन का कुचक्र विभिन्न प्रकार का है और उन मुसीबतों और अत्याचारों से अपनी रक्षा करने की उनकी क्षमता बहुत सीमित है। अस्पृश्यों पर जो अत्याचारों की घटनाएं साधारणतया सारे देश में घटित होती हैं, उनका वर्णन मद्रास सरकार के बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के दिनांक 5 नवंबर, 1892 के कार्यवाही सार संख्या 723 में किया गया है जिसका एक उद्धरण नीचे दिया जा रहा है -
फ्134µदमन के बहुत से तरीके हैं जिनकी ओर संक्षेप में संकेत दिया गया है। पेरियाओं द्वारा आदेश न मानने पर उनके मालिक उन्हें दंड देने के लिएµ
(क) गांव पंचायत में अथवा फौजदारी अदालत में उनके विरुद्ध झूठे
मामले दायर करते हैं।
(ख) पेरिया लोगों की बस्ती के चारों ओर जो परती जमीन है सरकार
से प्राप्त कर लिया जाता है और पेरियाओं के जानवरों को घेर लिया जाता
है तथा उन्हें मंदिरों में जाने से रोक दिया जाता है।