56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(ग) पेरिया लोगों के विरुद्ध सरकारी कागजात में छलकपट से मिरासियों
के नाम लिखवा देते हैं।
(घ) उनकी झोंपडि़यां गिरा कर नष्ट कर देते हैं और उन्हें ढकेल कर
पीछे कर देते हैं।
(घ) बहुत पुराने समय से चली आ रही शिकमी काश्तकारी के अधिकार
से उन्हें वंचित कर देते हैं।
(च) पेरिया की खेती जबरदस्ती काट लेते हैं और उनके एतराज करने
पर उन पर चोरी तथा दंगों का इल्जाम लगाते हैं।
(छ) गलतबयानी करके उनके पुश्तैनी अधिकारों को समाप्त कर उन्हें
बरबाद करते हैं।
(ज) उनके खेतों को जाने वाले पानी को रोक कर फसल सुखा देते हैं।
(झ) जमींदारों द्वारा लगान बाकी होने पर बिना कानूनी नोटिस दिए
उनकी जमीन से उन्हें बेदखल कर देते हैं।
135µसभी माल एवं फौजदारी मामलों को निपटाने के लिए भारत में न्यायालय हैं, परंतु उनसे गांव वालों की समस्याएं भी हल नहीं होतीं। न्यायालय में जाने की हिम्मत होनी चाहिए, कानूनी जानकारी में धन खर्च होता है। कानूनी खर्च की क्षमता होनी चाहिए और मुकदमों तथा अपीलों के दौरान जीवनयापन का साधन होना चाहिए। अधिकांश लोग निचली अदालत के फैसलों पर ही निर्भर करते हैं। जिन अधिकारियों के अधीन ये न्यायालय होते हैं, वे प्रायः भ्रष्ट होते हैं अथवा सामान्यतया वे धनाढ्यों तथा भूस्वामियों के वर्ग से संबंधित होते हैं।
136µऐसे धनाढ्यों और जमींदारों के वर्ग के होने के कारण वे अपने ही देश के लोगों को नहीं प्रभावित करते, बल्कि यूरोपवासियों को भी प्रभावित करते हैं। प्रत्येक कार्यालय ऊपर से नीचे तक उन्हीं धनाढ्यों और भूस्वामियों के प्रतिनिधियों से भरा हुआ है। उनकी मर्जी के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता। शासन में उनका बहुत दबदबा है।
इन परिस्थितियों में निस्संदेह दलित वर्गों का उत्थान उस समय तक केवल स्वप्न बनकर रह जाएगा, जब तक शासन की समस्त कार्य-प्रणाली की अग्रिम पंक्ति में उनके उत्थान को वरीयता नहीं दी जाएगी और जब तक शासन स्तर से सबको समान अवसर प्रदान करने की नीति नहीं अपनाई जाएगी। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दलित वर्गों का यह प्रस्ताव है कि शासन संविधान प्रदत्त नियम स्थायी रूप से लागू करने