3. तुच्छ चालें - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

गोलमेज सम्मेलन को जो रिपोर्ट दी थी उसका अध्ययन कर उसे समझाया जा सकता है। मैं उस समिति की रिपोर्ट के कुछ उद्धरण रख रहा हूंःµ

  1. सभी समितियों ने अपने दावे पेश किए कि सीटों की संख्या प्रत्येक सम्प्रदाय के अनुपात में निर्धारित की जाए। इस बात पर भी बल दिया गया कि उनके प्रतिनिधियों की संख्या उनकी जनसंख्या के अनुपात में किसी भी प्रकार कम नहीं होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व देने के संबंध में (1) नामजदगी, (2) सामान्य चुनाव और (3) पृथक चुनाव प्रणाली के तीन विकल्प अपनाए जा सकते हैं।

‘‘6. नामजदगी को सर्वसम्मति से अनुपयुक्त ठहराया गया।

‘‘7. संयुक्त निर्वाचन प्रणाली इस प्रतिबंध के साथ प्रस्तावित की गई कि विभिन्न समुदायों के लिए सीटें सुरक्षित की जाएं। इस प्रकार चुनावों को लोकतांत्रिक रूप दिया जा सकेगा। तभी चुनाव प्रणाली का उद्देश्य पूरा हो सकेगा। इस विषय में संदेह व्यक्त किया गया था कि क्या इस प्रकार अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व की गारंटी नहीं होगी, वह युक्तिसंगत होगा। या तो उन्हें मनोनीत किया जाएगा अथवा उसमें बहुसंख्यक की इच्छानुसार ही अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व मिल पाएगा।

इस ओर भी संकेत किया गया था कि वास्तव में यह सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का रूप होगा। सांप्रदायिक चुनाव के प्रति एतराज उठाए गए थे।

‘‘8. विचार-विमर्श से यह निष्कर्ष निकला कि केवल एक ही ऐसी मांग थी, जो सामान्यतया लोगों को स्वीकार हो सकती थी कि पृथक निर्वाचन प्रणाली अपनाई जाए। बहुत पहले से इस एतराज पर विचार हुआ। इन कठिन समस्याओं का हल ढूंढ निकालना भी इसमें समाहित था, जैसे कि प्रांतों तथा केंद्र में कितना-कितना सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यदि विधानसभाओं की समस्त सीटें समुदायों को दे दी जाएं, तो स्वतंत्र राजनैतिक विचार स्पष्ट करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी और दलित वर्गों की प्रतिनिधित्व की मांग उलझन में पड़ जाएगी। अतः चुनाव कराने के विचार से उन्हें हिंदू प्रतिनिधित्व में से काटकर प्रतिनिधित्व दे देना चाहिए और उन्हें मतदाता माना जाए।

‘‘9. यह सुझाव दिया गया कि विभिन्न समुदायों में सीटों के बंटवारे में जो एतराज होगा उसका सामना करने के लिए केवल ऐसा अनुपात निर्धारित