तुच्छ चालें
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किया जाए कि 80 अथवा 90 प्रतिशत सीटें पृथक निर्वाचन से भरी जाएं और शेष सीटें आम चुनाव द्वारा। यह कुछ समुदायों द्वारा मनोवांछित गारंटी न मिलने के कारण मान्य नहीं था।
‘‘10. उप-समिति के सदस्य, मौलाना मुहम्मद अली की योजना पर, जिनकी मृत्यु पर हमें खेद है, विचार-विमर्श में यह प्रस्ताव किया गया था कि जहां तक संभव हो कोई सांप्रदायिक अभ्यर्थी तब तक चुना हुआ न माना जाए, जब तक कि व्यवस्था के अनुसार दूसरे समुदायों के 40 प्रतिशत मत वह प्राप्त न कर ले। यद्यपि इस संबंध में कहा गया था कि जैसा कि उस योजना के लिए सांप्रदायिक रजिस्टर बनाना आवश्यक है, अतः जो लोग पृथक निर्वाचन के विरुद्ध थे, उनके समान एतराज करने की छूट थी।
‘‘11. महिलाओं को जिन्हें चुनावों में पुरुषों के बराबर दर्जा दिया जाता था, उनकी ओर से संयुक्त निर्वाचन पृथक मतदान अथवा सीट संरक्षण का कोई दावा नहीं किया गया था। परंतु राजनैतिक जीवन में पुरुषों के समान सक्रिय भाग ले सकें इस विचार से जनता को अवगत कराने के लिए और महिलाओं को व्यवस्थापिका में अंतरिम प्रतिनिधित्व देने के लिए कहा गया कि प्रथम तीन काउंसिलों में महिलाओं को 5 प्रतिशत स्थान दिया जाए और उनकी पूर्ति निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार नियमित करके की जाए।
‘‘12. उप-समिति संख्या 2 (प्रांतीय संविधान) की इस सिफारिश पर आम सहमति थी कि नए संविधान के सफल कार्यकरण के लिए महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदायों का प्रांतीय कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व सर्वाधिक व्यावहारिक महत्व रखता था। इस बात पर भी सहमति थी कि उस आधार पर मुसलमानों को संघीय कार्यपालिका में भी प्रतिनिधित्व मिले। छोटे अल्पसंख्यकों की ओर से प्रांतीय और संघीय कार्यपालिकाओं में उनके प्रतिनिधित्व के लिए दावा पेश किया गया था, वह चाहे व्यक्तिगत हो अथवा सामूहिक रूप से हो अथवा यदि ऐसा करना संभव हो, तो प्रत्येक मंत्रिमंडल में एक मंत्री को मुख्यतया उन अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए नियुक्त किया जाए।
(डॉक्टर अम्बेडकर तथा सरदार उज्जल सिंह उपर्युक्त पैरा 12 में फ्मुसलमानय् शब्द के बाद फ्और अन्य महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकय् शब्द जोड़ेंगे)।