60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उस योजना के अंतर्गत उत्तरदायी कार्यपालिका को संयुक्त रूप में कार्य
करने में जो कठिनाई होगी उसकी ओर भी संकेत किया गया था।
‘‘13. जहां तक प्रशासन का संबंध है - यह आम सहमति थी कि प्रांतीय
तथा केंद्रीय नौकरियों में भर्ती का कार्य लोक सेवा आयोगों को सौंप दिया
जाए, जिन्हें निर्देश हो कि वे नौकरियों में विभिन्न समुदायों के उम्मीदवारों की
योग्यता तथा नौकरियों के मापदंड का ध्यान रखते हुए यथोचित प्रतिनिधित्व
प्रदान करें।
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‘‘16. यह भी स्पष्ट किया गया है कि ब्रिटिश सरकार किसी सहमति
से समुदायों पर कोई ऐसा चुनाव सिद्धांत अपनी ओर से नहीं थोप सकती,
जिसका किसी प्रकार का कोई विरोध हो। इसलिए यह स्पष्ट कर दिया गया
था कि कमियों एवं कठिनाइयों के होते हुए भी समझौता न होने पर नए
संविधान के अंतर्गत पृथक मतदान प्रणाली को ही चुनाव व्यवस्था का आधार
रखना होगा। इससे अनुपात का प्रश्न उठेगा। ऐसी परिस्थितियों में दलित वर्गों
के दावों पर समुचित विचार करना होगा।
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‘‘18. अल्पसंख्यक तथा दलित वर्गों के लोग इस बात पर अटल थे
कि वे भारत के लिए किसी स्वायत्तशासी संविधान के लिए अपनी सहमति
तब तक नहीं देंगे जब तक कि उसमें उनकी मांगों को यथार्थ रूप में नहीं
मान लिया जाएगा।’’
गोलमेज सम्मेलन द्वारा दूसरी समिति फ्संघीय ढांचा समितिय् से जो केंद्रीय सरकार के कार्यक्रमों पर विचार करने हेतु नियुक्त की गई थी, उसे संघीय विधायिका से संबंधित अस्पृश्यों के प्रश्न पर भी विचार करना था। गोलमेज सम्मेलन को दी गई रिपोर्ट में कहा गया था -
फ्उप-समिति में सर्व सम्मति से यह विचार प्रकट किया गया था कि दलित
वर्गों, ईसाइयों, यूरोपियनों, एंग्लो-इंडियनों, जमींदारों, व्यापारियों (यूरोपीय एवं
भारतीय) और श्रमिकों को जहां तक संभव हो, दोनों सदनों में मुख्यतया
निम्न सदन (लोअर चैम्बर) में प्रतिनिधित्व दिया जाए।य्