तुच्छ चालें
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III
गोलमेज सम्मेलन का प्रथम सत्र समाप्त होने से पहले ही उपरोक्त दोनों समितियों की रिपोर्ट गोलमेज सम्मेलन को प्रस्तुत कर दी गई और उसे पारित कर दिया गया। ध्यान देने योग्य बात यह थी कि यद्यपि रिपोर्ट को विस्तृत रूप में संपूर्ण सहमति प्राप्त नहीं हुई थी, परंतु राजनैतिक एवं संवैधानिक मामलों में अस्पृश्यों का पृथक अस्तित्व आम सहमति से स्वीकार कर लिया गया था।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन के समाप्त होने से पहले इस निर्णय पर राजनीतिक दलों में से केवल कांग्रेस का रवैया स्पष्ट नहीं था। इसका कारण यह था कि कांग्रेस ने गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार किया था और सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने में लगी थी। कुछ समय पश्चात् दूसरा गोलमेज सम्मेलन भी आरंभ होने का समय आ गया। ब्रिटिश सरकार तथा कांग्रेस में समझौता हुआ जिसके फलस्वरूप कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गई और गोलमेज सम्मेलन के सामने जो समस्याएं उठीं उनका हल ढूंढ निकालने में कांग्रेस भी अपना योगदान करने पर सहमत हो गई। गोलमेज सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन में प्रतिनिधियों की भागीदारी और उस समय के सद्भाव के वातावरण से चाहत और राहत देने की भावना देखी गई थी, उससे यह भावना प्रकट हुई कि एक के बाद अगले सम्मेलन में प्रगति की आशा है। वास्तव में सम्मेलन में कांग्रेस द्वारा भाग लेने के कारण और तेजी से प्रगति की आशा थी। वास्तव में कांग्रेस के मित्रों का यही कहना था कि यदि प्रथम सम्मेलन में कांग्रेस की अनुपस्थिति किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाने का एकमात्र कारण थी।
इसलिए गोलमेज सम्मेलन में और सफलता के लिए सबकी निगाहें कांग्रेस पर थीं। दुर्भाग्यवश सभा के लिए कांग्रेस ने अपना प्रतिनिधि श्री गांधी जैसे कुपात्र को नहीं चुनना चाहिए था। एकजुटता लाने की शक्ति में वह असफल रहे। उन्होंने अपने आपको नम्रता की मूर्ति दिखाने का प्रयत्न किया। परंतु गोलमेज सम्मेलन में उनके व्यवहार से स्पष्ट हो जाता है कि श्री गांधी विजय के मुहाने पर कितने संकुचित हो सकते थे। सरकार से समझौते के बाद जैसे श्री गांधी ने सम्मेलन में भाग लिया, उन्होंने संपूर्ण गैर-कांग्रेसियों के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया। जब कभी देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर आया तो श्री गांधी ने यह कहकर दूसरों का अनादर किया कि उन लोगों की कोई हस्ती नहीं है, केवल वही उस कांग्रेस के प्रतिनिधि हैं, जो सारे देश का प्रतिनिधित्व करती है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल को एकताबद्ध करने के बजाए श्री गांधी ने उनमें वैमनस्य की खाई और चौड़ी कर दी। यदि प्रस्तुत विषयों को जानकारी की दृष्टि से देखा जाए, तो उसमें श्री गांधी ने अपने आपको