62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अति अल्पज्ञ प्रमाणित किया। जिन संवैधानिक तथा सांप्रदायिक प्रश्नों पर गोलमेज सम्मेलन में विचार हुआ वहां श्री गांधी रचनात्मक सुझाव न दे सके और व्यर्थ की बातें कहीं। उन्होंने अपने आपको एक मतिभ्रम व्यक्ति के रूप में प्रकट किया, ताकि कोई समझौता न हो सके। उन्होंने मूलभूत सिद्धांतों को भी काटा।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में अस्पृश्यों की मांगों पर श्री गांधी का रुख उनके अजीबोगरीब चरित्र का द्योतक है। जब दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए सभी प्रतिनिधि एकत्र हुए तब संघीय ढांचा समिति (फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी) की प्रथम बैठक हुई। संघीय ढांचा समिति में दिनांक 15 सितंबर, 1931 को श्री गांधी ने अपना जो प्रथम भाषण दिया उसमें उन्होंने अस्पृश्यों की समस्या पर इस प्रकार कहा µ
फ्कांग्रेस ने अस्तित्व में आते ही तथाकथित अस्पृश्यों की समस्या अपने
हाथों में ले ली है। कोई समय था जबकि सामाजिक सम्मेलन कांग्रेस के
वार्षिक अधिवेशनों का प्रमुख अंग हुआ करता था, जिसके लिए स्व. रानाडे
ने अपनी शक्ति लगा दी थी। अस्पृश्यों से संबंधित सुधार के विषय को
प्रमुख स्थान दिया गया था। परंतु 1920 में कांग्रेस ने अस्पृश्यता निवारण के
प्रश्न के लिए बड़ा कदम उठाया, जिससे कि अस्पृश्यता निवारण कांग्रेस मंच
का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम बन जाए। कांग्रेस ने सभी वर्गों में एकता लाने
के लिए हिंदू और मुस्लिम एकता को स्वराज प्राप्त करने के लिए जितना
आवश्यक समझा, उतना ही सभी वर्गों में एकता और अस्पृश्यता निवारण
पर बल दिया था। कांग्रेस की अस्पृश्यों के हित में जो स्थिति 1920 में थी
वही आज भी है। इस प्रकार आप देखेंगे कि कांग्रेस ने शुरू से ही राष्ट्रीय
हित के प्रश्नों पर कार्य किया।य्
जिस किसी ने इस विषय पर अध्ययन किया होगा, उसे ज्ञात होगा कि वर्ष 1922 मे कांग्रेस ने बारदोली कार्यक्रम में अस्पृश्योद्वार की जिस योजना को स्वीकार किया था, कांग्रेस कितनी विफल रही और वह कार्य उसने किस प्रकार हिंदू महासभा के मत्थे मढ़ दिया। किसी को भी यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि गांधी जी ने ऊपर जो कुछ कहा, बिल्कुल झूठ था। श्री गांधी के भाषण से यह संकेत नहीं मिलता कि श्री गांधी अस्पृश्यों की मांगों पर क्या करने वाले थे, यद्यपि मैं उनका अभिप्राय समझ गया था। ख्1,
- प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जाने से पहले मैं बम्बई में श्री गांधी से मिला था। उन्होंने मुझसे कहा था
कि वह राजनीतिक मामलों में अछूतों के पृथक अस्तित्व के पक्ष में नहीं हैं।