3. तुच्छ चालें - Page 82

तुच्छ चालें

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नहीं कर रहा हूं क्योंकि मुझे एक सप्ताह पहले दलित वर्गों के प्रश्न पर श्री गांधी से बात करने का अवसर प्राप्त हुआ था और दूसरे अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य हम लोग कल जब श्री गांधी से उनके कार्यालय में मिले, तो उन्होंने हमसे स्पष्ट रूप से कहा कि संघीय ढांचा समिति के सामने जो कुछ उन्होंने कहा था, उसी रवैए पर वह अडिग और वही उनका सुविचारित मत है। मैं कहना चाहूंगा कि जब एक दलित वर्गों को उस अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता नहीं होगी, तब तक मैं नहीं समझता कि इस संबंध में श्री गांधी द्वारा प्रस्तावित कमेटी में मेरे शामिल होने से कोई मतलब हल होगा। इसलिए जब तक हमें यह आश्वासन नहीं मिल जाता कि यह समिति इस ढंग से कार्य करती है कि सभी समुदाय जिनके लिए पिछले वर्ष अल्पसंख्यक उप-समिति ने भारत के भावी संविधान में शामिल करने की सिफारिश की थी, मैं नहीं समझता कि मैं स्थगन के प्रस्ताव का समर्थन हृदय से कर सकूं। मैं यही स्पष्ट करना चाहता हूं।

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फ्डॉ. अम्बेडकर - मैं अपनी स्थिति और भी स्पष्ट करता हूं। ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने जो कुछ कहा उससे लोगों में कुछ भ्रांतियां पैदा हो गई हैं। मुझे स्थगन पर आपत्ति नहीं है। मैं समस्या पर विचार करने के लिए नियुक्त की जाने वाली किसी समिति का सदस्य बनने पर भी एतराज नहीं उठा रहा हूं। यदि वे मुझे इस समिति का सदस्य बनने का सम्मान प्रदान करते हैं तो इसमें शामिल होने से पहले मैं जानना चाहूंगा कि वह समिति किस समस्या पर विचार करने जा रही है। क्या हिंदू और मुसलमान के बीच जो परस्पर-विरोधी रवैया है उससे संबंधित प्रश्न पर विचार किया जाना है? क्या उस समिति में पंजाब के सिक्खों और मुसलमानों के प्रश्न पर विचार किया जाना है, अथवा ईसाइयों, एंग्ला-ेइंडियनों और दलित वर्गों के प्रश्न पर भी बातचीत होगी?

फ्चर्चा आरंभ करने से पहले यदि हम यह भली-भांति समझ लें कि यह समिति हिंदू और मुसलमानों, हिन्दुओं और सिक्खों के प्रश्न पर विचार करने के साथ-साथ ईसाइयों, एंग्लो इंडियनों तथा दलित वर्गों के प्रश्न पर भी विचार करने की जिम्मेदारी निभाएगी तो मैं इस बात के लिए पूरी तरह सहमत हूं कि इस स्थगन प्रस्ताव को बिना किसी आपत्ति के पारित किया जाए। मैं फिर भी यह कहना चाहता हूं कि यदि मेरी बात नहीं मानी गई और