तुच्छ चालें
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स्थगन के बाद हुई अनौपचारिक बैठक में जो कुछ हुआ उसके बारे में मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है। यह बैठक पूरी तरह असफल रही। इसके अध्यक्ष श्री गांधी थे। श्री गांधी ने सांप्रदायिक प्रश्न के जटिलतम भाग अर्थात् पंजाब में सिख-मुस्ल्मि झगड़े से आरंभ किया। किसी स्तर तक मामला सुलझता लगा, जबकि दोनों पक्ष पंच के फैसले के लिए सहमत हो गए। यद्यपि सिख चाहते थे कि जब तक पंच का नाम मालूम न हो जाए, आगे कोई कार्रवाई न की जाए, जबकि मुसलमान पंच का नाम प्रकट करने के लिए तैयार न थे। अस्पृश्यों जैसे दूसरे अल्पसंख्यकों की समस्या हल करने में श्री गांधी को रुचि नहीं थी यद्यपि उन्होनें दूसरे अल्पसंख्यकों की मांगों की सूची प्रस्तुत करने के लिए उनके प्रतिनिधियों से कहा था। श्री गांधी ने उनकी मांगों को सुना, परंतु अनसुना करने के लिए। क्या श्री गांधी ने उन मांगों को बैठक में विचार करने के लिए रखा? जैसे ही सिखों और मुसलमानों के बीच समझौता विफल हुआ वैसे ही श्री गांधी ने बैठक भंग कर दी। अल्पसंख्यक समिति की बैठक 8 अक्तूबर, 1931 को हुई। प्रधानमंत्री ने श्री गांधी को पहले बोलने के लिए कहा। श्री गांधी ने कहा -
फ्प्रधानमंत्री एवं मित्रों! बड़े खेद एवं दुःख के साथ मुझे कहना पड़ रहा है
कि विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों के मध्य आपसी वार्तालाप द्वारा सांप्रदायिक
प्रश्न को पारस्परिक सहमति के आधार पर हल करने की दिशा में मैं
एकदम नाकाम रहा। एक सप्ताह निरर्थक गंवाने के लिए, प्रधानमंत्री एवं
मित्रों, मैं आपसे क्षमा चाहता हूं। जब मैंने इस कठिन काय्र को अपने हाथों
में लिया था मैं सोचता था कि इस कार्य में मुझे सफलता मिलेगी। मुझे धैर्य
एवं संतोष इसी बात में है कि मैंने इसका हल ढूंढ निकालने में कोई कसर
नहीं उठा रखी।
परंतु यह कहना पूर्णतया सत्य नहीं होगा कि हमारी बातचीत पूर्णतया
विफल रही। वार्तालाप की असफलता का कारण भारतीय शिष्टमंडल के
सदस्य थे। हम लगभग सभी लोग उन दलों के जिनका हमें प्रतिनिधित्व
करना था निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं, हमें सरकार ने नामनिर्देशित किया है।
उस बैठक में एक सर्वमान्य हल पर पहुंचने के लिए जिन प्रतिनिधियों की
उपस्थिति नितांत आवयक थी, वे भी उस शिष्टमंडल में नहीं थे। आगे मैं
कहना चाहूंगा कि यह अल्पसंख्यक समिति बुलाने का समय नहीं था, इसमें
यथार्थ की भावना नहीं है क्योंकि हमें पता ही नहीं है कि हमें क्या प्राप्त
करना है। यदि हमें यह ज्ञात होता कि हम चाहते हैं, उसके बदले ऐसी