तुच्छ चालें
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भाग लूं जब तक कि मैं यह नहीं समझ पाऊं कि उस समय तक मेरी तथा
मेरे समुदाय की क्या स्थिति होगी।य्
प्रधानमंत्री ने अपने समापन में कहा µ
फ्हम बैठक स्थगित करते हैं। मैं दुबारा आप लोगों की बैठक बुलाऊंगा। इस
बीच मैं चाहूंगा कि मेरे सामने जो लोग बैठे हुए हैं, जो अल्पसंख्यकों के
प्रतिनिधि हैं वे भी अपनी ओर से प्रयत्न करें।
यदि आप लोगों में कोई आम सहमति हो जाती है, तो मेरी राय है कि
उससे सबको अवगत कराएं........। ब्रिटिश सरकार आपके समझौते में आड़े
नहीं आएगी। इसलिए मैं चाहता हूं कि हमने अब तक जो निराशाजनक बातें
सुनीं, उन्हें छोड़कर अब अपने दिलों में यह बात रखें कि ब्रिटिश सरकार आगे
बढ़ना चाहती है। क्योंकि ब्रिटिश सरकार कृतसंकल्प है कि भारत में ऐसा
सुधार किया जाए जो हमारे विचारों से मेल खाता हो और जिससे स्वतंत्रता
की ओर कदम बढ़ता हो। यही हम चाहते हैं। मैं सभी प्रतिनिधियों से अपील
करता हूं कि प्रगति में किसी भी प्रकार के रोड़े न अटकाएं।
IV
प्रधानमंत्री के सुझाव के अनुसार अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधियों ने इस उद्देश्य से अनौपचारिक बातचीत की कि वे इसका कोई हल निकालें। उन्होंने आपस में विचार-विमर्श कर एक करार तैयार किया और उसे 13 नवंबर, 1931 को अल्पसंख्यक समिति की बैठक की पूर्वसंध्या पर प्रधानमंत्री को प्रस्तुत किया। उस बैठक का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा -
फ्आरंभ से ही इस समिति का कार्य बहुत महत्वपूर्ण रहा है। आज मुझे इस
बात पर खेद है कि आप सब लोग एक सर्वमान्य समाधान पर पहुंचने में
असफल रहे हैं।
फ्कल रात एक प्रतिनिधिमंडल मुझसे मिला था जिसमें मुसलमानों, दलित
वर्गों तथा कुछ हद तक भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और ब्रिटिश समुदाय
के प्रतिनिधि थे। वे कल रात हाउस ऑफ कॉमन्स में मेरे कक्ष में आकर
मुझसे मिले। उनके पास तैयार किया गया वह सहमति पत्र भी था, जिस पर
उन सबकी आम राय थी। उन्होंने मुझे बतलाया कि उस समझौते में ब्रिटिश
भारत की 46 प्रतिशत जनता की मांग समाविष्ट है।