3. तुच्छ चालें - Page 91

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्क्या इस समिति के समस्त सदस्यगण सांप्रदायिक समस्या को हल करने के

लिए मुझसे लिखित अनुरोध करेंगे और मेरे द्वारा किए गए फैसले को स्वीकार

कर लेंगे? मैं समझता हूं कि यह अच्छा प्रस्ताव है........ क्या सदस्यगण ऐसा

अनुरोध करते हुए यह प्रण करेंगे कि मैं किसी वर्ग या व्यक्ति से ऐसा नहीं

चाहता हूं, चाहे वह अस्थायी ही हो और आप सभी लोग उस पर अपनी

सहमति प्रदान करेंगे? मैं अभी ऐसा नहीं चाहता, मैं कहता हूं कि क्या आप

लोग इस विश्वास के साथ दिए गए फैसले को मानेंगे और नए संविधान

के अनुसार पूरी क्षमता के साथ कार्य करेंगे और अपने नाम लिखकर देंगे?

मैंने कई वर्गों से कम से कम कुछ व्यक्तियों से भी समय-समय पर कहा

है, परंतु उसका कोई परिणाम नहीं निकला। इससे स्थिति में सरलता आएगी,

परंतु उसे दरकिनार करते हुए उन बातों को न भूल जाएं, जो मैंने बैठक

का आरंभ करते हुए कही थी कि संविधान निर्माण की अपेक्षा सरकार को

सांप्रदायिक मतभेदों को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।य्

V

इस प्रकार अल्पसंख्यक समिति द्वारा सांप्रदायिक समस्या का हल ढूंढ निकालने के समस्त प्रयत्नों पर पानी फिर गया। समिति में बहस के कारण श्री गांधी का ध्यान अस्पृश्यों की ओर गया। प्रत्येक ने अनुभव किया कि श्री गांधी अस्पृश्यों के कट्टठ्ठर शत्रु हैं। अस्पृश्यों के प्रश्न पर श्री गांधी ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी और अपना सारा ध्यान केंद्रित कर दिया, जैसे कि श्री गांधी का गोलमेज सम्मेलन में जाने का मुख्य उद्देश्य अस्पृश्यों की मांगों की काट करना ही रहा हो। जो श्री गांधी के मित्र थे, वे भी अस्पृश्यों की मांगों के प्रति श्री गांधी का वास्तविक रूप देखकर सकते में पड़ गए। मुसलमानों तथा सिखों की मांग पर श्री गांधी की सहमति तथा अस्पृश्यों की मांग को नकार देना उनके लिए बड़े अचरज की बात थी। उन्होंने इस विषय पर जो कुछ स्पष्टीकरण मांगे श्री गांधी उनका विरोध करने का कोई तार्किक उत्तर नहीं दे सके। गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी का तर्क यही था कि हिंदुओं ने अस्पृश्यों के उद्धार का कार्य गंभीरता से लिया है और इसीलिए उन्हें राजनैतिक संरक्षण देने का कोई औचित्य नहीं। गोलमेज सम्मेलन के बाहर श्री गांधी ने इसके विपरीत जो कारण प्रस्तुत किया था वह इस प्रकार है - श्री गांधी ने अपने पक्ष में कहा µ

फ्मुसलमान और सिख भली-भांति संगठित हैं, परंतु अस्पृश्य नहीं। उनमें

राजनैतिक चेतना बहुत कम है। वे काफी सताए हुए और भयाक्रांत हैं, उनके

प्रति भीषण दुर्व्यवहार हुआ है। मैं उन्हें भय से मुक्ति दिलाना चाहता हूं।