तुच्छ चालें
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यदि उनके लिए पृथक मतदान की व्यवस्था कर दी जाएगी, तो गांवों में उनकी दशा बहुत दयनीय हो जाएगी। वहां कट्टठ्ठर हिंदुओं का ही प्रभुत्व है। वहां हिंदुओं का ही उच्च वर्ग है, जिन्होंने युगों से अस्पृश्यों की उपेक्षा का पश्चाताप करना है। यह पश्चाताप उनका सामाजिक सुधार तथा उनकी सेवा करके ही किया जा सकता है, उनके लिए पृथक निर्वाचन मांगकर नहीं। पृथक मतदान से उनके और हिदुओं के बीच झगड़े खड़े होंगे और उन्हें हिंदुओं से अलग कर देंगे। आपको समझ लेना चाहिए कि मैं सिखों और मुसलमानों के विशेष प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव को सहन कर सकता हूं, मुझे विश्वास है कि अस्पृश्यों के लिए यह गंभीर खतरे की बात होगी। मुझे विश्वास है कि अस्पृश्यों के लिए पृथक मतदान वर्तमान सरकार की ताजा तरकीब है। केवल इस बात की आवश्यकता है कि मतदान सूची में उनके नाम होने चाहिए और संविधान में उन्हें मौलिक अधिकार दिए जाएं। ऐसे मामलों में जहां उनके साथ अनुचित व्यवहार किए जाएं और उनके प्रतिनिधि को जानबूझकर बाहर कर दिया जाए, तो उन्हें विशेष चुनाव पंचाट का अधिकार हो कि चुने गए अभ्यर्थी को हटाकर उस व्यक्ति को सीट देने का अवसर दें, जो हार गया था। पृथक मतदान से वे सदा के लिए अलग हो जाएंगे। मुसलमान सदा मुसलमान रहेगा। क्या आप अस्पृश्यों को सदा के लिए अस्पृश्य ही बनाए रखना चाहते हैं? पृथक मतदान इस कलंक को अमिट और पक्का बना देगा। आवश्यकता इस बात की है कि अस्पृश्यता समाप्त की जाए और जब आप इतना कर लेंगे, तब जो पृथकता का भाव उच्च वर्ग द्वारा निम्न वर्ग पर लादा गया है, समाप्त हो जाएगा। जब आप पृथकता के भेद को नष्ट कर देंगे, तब आप किसे पृथक निर्वाचन देंगे? आप यूरोप के इतिहास पर दृष्टिपात करें। क्या आपने श्रमिक वर्ग अथवा वहां की महिलाओं को पृथक मतदान अधिकार दिया था? आप अछूतों को वयस्क मताधिकार देकर उन्हें संरक्षण प्रदान करें। यहां तक कि दंभी हिंदू भी उनसे वोट मांगने जाएंगे।
फ्तब आप पूछेंगे कि क्या डॉ. अम्बेडकर तब भी उनके प्रतिनिधि के रूप में पृथक मतदान अधिकार की मांग करेंगे? मैं डॉ. अम्बेडकर की बड़ी इज्जत करता हूं। उन्हें क्षुब्ध होने का पूरा अधिकार है। यह स्वयं उनके धैर्य की बात है कि वे हमारा सिर नहीं तोड़ सकते। वह आजकल इतने अधिक अविश्वास और शंका से भरे हुए हैं कि उन्हें उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता। उन्हें प्रत्येक हिंदू अस्पृश्यों का पक्का शत्रु नजर आता है और यह स्वाभाविक है। आरंभ में दक्षिणी अफ्रीका में मेरे साथ भी यही स्थिति थी। मैं जहां कहीं जाता यूरोपियन लोगों द्वारा सताया जाता। यह डॉ. अम्बेडकर