78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लिए स्वाभाविक है कि उनके खून में उबाल आ जाए, परंतु उन्होंने जो
पृथक मतदान की मांग की है, उससे समाज सुधार नहीं होगा, भले ही वे
सत्ता और अपनी हैसियत बढ़ा लें। परंतु इससे अस्पृश्यों का कोई हित नहीं
होगा। मैं साधिकार यह कह सकता हूं, क्योंकि मैं उन अस्पृश्यों के साथ रहा
हूं और वर्षों तक उनके सुख-दुःख में हिस्सेदार रहा हूं।य्
गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी केवल प्रचार से संतुष्ट न थे। जब उन्होंने देखा कि प्रचार करने से भी कोई आशातीत सफलता हाथ नहीं लग रही है, तो वे षड्यंत्र पर उतर आए। जब श्री गांधी ने सुना कि प्रधानमंत्री की राय के अनुसार अल्पसंख्यक समझौता प्रस्तुत होने वाला है और उस समझौते से अस्पृश्यों को सभी अन्य अल्पसंख्यकों का समर्थन मिलने वाला है, विशेषकर मुसलमानों के समर्थन से तो श्री गांधी परेशान हो गए, तो उन्होंने अस्पृश्यों को अलग-थलग करने के लिए नया पासा फेंका। इसके लिए श्री गांधी ने मुसलमानों की 14 मांगें मान लीं और उन्हें अस्पृश्यों से अलग करने की योजना बनाई यद्यपि वे ऐसा करने के लिए पहले सहमत नहीं थे। जब उन्होंने देखा कि मुसलमान अस्पृश्यों को समर्थन दे रहे हैं, तब श्री गांधी ने उनकी 14 सूत्रीय मांग इस सौदेबाजी के साथ मानने के प्रति सहमति प्रकट की कि वे अस्पृश्यों को समर्थन न दें। जो सुलहनामा तैयार किया गया वह इस प्रकार था -
गांधी मुस्लिम समझौते का प्रारूप ख्1,
गोलमेज सम्मेलन में मुस्लिम प्रतिनिधि ख्2,
टेलीफोनः विक्टोरिया - 2360 क्वीन्स हाउस तारः कोर्ट लाइफ - लंदन 57-सेंटजेम्स कोर्ट
बकिंघम गेट लंदन, एस.डब्ल्यू।
6 अक्तूबर, 1931
श्री गांधी तथा मुस्लिम प्रतिनिधियों की कल रात 10 बजे जिन प्रस्तावों पर बहस हुई थी, वे दो भागों में विभाजित हैं - अपने हितों की सुरक्षा के लिए मुसलमानों ने जो प्रस्ताव रखे तथा श्री गांधी ने कांग्रेस की नीति के संबंध में जो प्रस्ताव रखे। उन दोनों प्रस्तावों पर श्री गांधी ने स्वीकृति प्रदान की और वे मुस्लिम प्रतिनिधि-मंडल के सामने विचारार्थ रखे गए -
- यह दस्तावेज मैंने 1939 में अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में परिशिष्ट के रूप में छापा था। यह
उस समय पहली बार प्रकाशित हुआ था। इसकी प्रामाणिकता पर कभी भी सन्देह नहीं किया गया। 2. इससे पता चलता है कि यह दस्तावेज मुस्लिम लीग प्रतिनिधि-मण्डल के लैटर-पैड पर टाइप किया
गया था।