80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- यह कि निम्नांकित विषयों पर भी
सहमति हुई थीµ ( I ) सिंध 1,
( II ) उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत 2,
( III ) सेवाएं3, ( IV ) मंत्रिमंडल4,
( V ) मौलिक अधिकार तथा
धार्मिक एवं सांस्कृतिक मामलों
में संरक्षण, ( VI ) किसी भी
संप्रदाय के विरुद्ध कानून बनाने
पर सुरक्षात्मक उपाय।
यह सत्य है कि इस समझौते के प्रारूप में अस्पृश्यों का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया। परंतु मुसलमान सिखों के अतिरिक्त किसी अन्य समुदाय को समर्थन न देने के लिए वचनबद्ध थे - इस बात से साफ स्पष्ट है कि वे अस्पृश्यों को कोई समर्थन नहीं देना चाहते थे। इस षड्यंत्र में श्री गांधी ने मुंह की खाई, जो स्वाभाविक था। मुसलमान, जो अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग कर रहे थे, अपने वायदे पर नहीं टिक सके और अस्पृश्यों की मांगों के विरोध पर चुप लगा गए और उसका विरोध नहीं किया। श्री गांधी अस्पृश्यों को दबाने की धुन में इतना बौखलाए कि भले बुरे का भेद ही नहीं कर सके। श्री गांधी अपने शब्दों पर टिके नहीं रहे। अल्पसंख्यक समिति में श्री गांधी ने कहा था कि यदि समिति अस्पृश्यों के पृथक मतदान की मांग पर सहमत होती है, तो उसे इसका अधिकार है। उसका अर्थ था बहुमत के फैसले को मानना। परंतु जब उन्हें मालूम हुआ कि दूसरे अल्पसंख्यक अस्पृश्यों की मांगो का समर्थन कर रहे हैं, तब श्री गांधी का मुसलमानों के पास आकर उनकी चौदह सूत्रीय मांग बेहिचक स्वीकार कर ले, जिन्हें कांग्रेस हिंदू महासभा, यहां तक कि साइमन कमीशन भी अस्वीकार कर चुका था। श्री गांधी ने लोकमत की भी अनदेखी कर दी। नैतिकता का जुलूस निकाल दिया। पर उनकी शैतानी चाल भी न चल पाई, क्योंकि मुसलमानों ने उनको मझधार में छोड़ दिया। जब गोलमेज सम्मेलन के दूसरे सत्र का अवसान हो गया, तब अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, जिसमें लिखित रूप से प्रधानमंत्री को अधिकृत किया गया था कि वह पंच के तौर पर सांप्रदायिक समस्या पर निर्णय दें। इस बात को अल्पसंख्यकों ने भी मान
सिंध का पृथक्करण अभ्रिपेत है।
पश्चिमोत्तर प्रांत में प्रांतीय स्वायत्तता और उत्तरदायी सरकार अभिप्रेत है।
सेवाओं में प्रतिनिधित्व अभिप्रेत है।
मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व अभिप्रेत है।