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तुच्छ चालें

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लिया था। श्री गांधी ख्1, सहित बहुत से प्रतिनिधियों ने भी यह लिखित रूप में दिया था। प्रतिनिधियों को अब कुछ करना ही नहीं था और भारत आकर प्रधानमंत्री के निर्णय की प्रतीक्षा करनी थी जिसके लिए उन्हें खुश-खुशी पंच बनाया गया था।

VI

इसके पहले कि इस विषय में कुछ कहूं, प्रधानमंत्री ने क्या फैसला दिया, मैंने मताधिकार समिति के सदस्य की हैसियत से, जो अजीब हालत देखी, मैं उसको बताना चाहता हूं। दूसरे गोलमेज सम्मेलन समाप्त होने के बाद, प्रधानमंत्री ने नए संविधान में मताधिकार के प्रश्न पर विचार करने के लिए एक समिति द्वारा जांच-पड़ताल कराने की सलाह दी। तदनुसार दिसंबर 1931 में लॉर्ड लोथियन के सभापतित्व में एक कमेटी नियुक्त की गई। इसका उद्देश्य था, मताधिकार की व्यवस्था के लिए सुझाव देना। इस विषय में प्रधानमंत्री ने, जो पत्र लिखा था, उसकी भाषा इस प्रकार थी -

फ्विधायकों में जिन्हें उत्तरदायित्व दिया जाने वाला है, जनसाधारण का

प्रतिनिधित्व होना चाहिए और किसी समाज के किसी भी महत्वपूर्ण वर्ग के

लिए अपनी आवश्यकताओं और विचारों को व्यक्त करने के साधनों की

कमी नहीं होनी चाहिए।य्

समिति ने जनवरी 1932 में अपना कार्य आरंभ किया। अपना काम निपटाने के लिए उसने प्रांतीय सरकारों का सहयोग लिया और सभी प्रांतों में इस काम के लिए प्रांतीय स्तर पर प्रांतीय मताधिकार समितियां बनाई गईं, जिसमें गैर-सरकारी सदस्य रखे गए। समिति ने प्रश्नावली जारी की। प्रांतीय सरकारों ने प्रांतीय मताधिकार समितियां तथा व्यक्तिगत तौर पर लोगों ने उन प्रश्नों के उत्तर भेजे। प्रत्येक प्रांतीय मताधिकार समिति ने साक्ष्यों की जांच की। प्रांतीय सरकारों तथा प्रांतीय समितियों ने केंद्रीय समिति को अपनी अलग-अलग रिपोर्ट भेजी। केंद्रीय समिति ने किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उन प्रांतीय समितियों तथा प्रांतीय मताधिकार समितियों से उन रिपोर्टों पर विचार विमर्श किया। लोथियन समिति को दिए गए सामान्य कार्य के अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने एक मुख्य कार्य भी उसको सौंपा था, जो अस्पृश्यों की राजनैतिक मांगों के संबंध में था। प्रधानमंत्री ने कमेटी के अध्यक्ष को अपने पत्र में, जो निर्देश दिए थे, वे इस प्रकार थे-

फ्गोलमेज सम्मेलन की विभिन्न बैठकों में हुए विचार-विमर्श से स्पष्ट है कि

नए संविधान में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की समुचित व्यवस्था अवश्य

  1. मैंने ऐसा कुछ लिखकर नहीं दिया था। मैंने महसूस किया था कि अस्पृश्यों की मांगें इतनी न्यायोचित

हैं कि उसके लिए पंच-फैसले की आवश्यकता नहीं थी।