3. तुच्छ चालें - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

होनी चाहिए। नामजदगी द्वारा किए जाने वाले प्रतिनिधित्व के तरीके को अब

उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। जैसा कि आपको विदित है, दलित वर्गों के

लिए पृथक मतदान व्यवस्था के प्रश्न पर मतभेद हैं और आपकी समिति इस

प्रश्न को हल करने के लिए इसकी जांच-पड़ताल करे कि दलित वर्गों के लिए

ऐसा करना कहां तक उचित रहेगा और जनसाधारण के मताधिकार सुरक्षित रह

सकें। दूसरी बात यह है कि दलित वर्गों के लिए पृथक मतदान की व्यवस्था

पर अंतिम रूप से निर्णयले लिया जाए कि जिन प्रांतों में जनसंख्या के अनुसार

उनका पृथक अस्तित्व है, आपकी समिति मताधिकार की समस्या पर गंभीरता

से विचार करे, जिससे सभी तथ्यों को सम्मिलित करके दलित वर्गों के पृथक

प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का हल ढूंढने में सुविधा हो।य्

इन निर्देशों का पालन करने से अंग्रेजी राज में समिति के सामने अस्पृश्यों की समस्त जनसंख्या के लिए हल ढूंढ निकालने का भारी काम था।

अस्पृश्यों की कितनी जनसंख्या है, इस प्रश्न के उत्तर चौंकाने वाले थे। जो साक्ष्य प्रस्तुत किए गए उनके अनुसार प्रांतों में अस्पृश्यों की जनसंख्या बहुत कम है। ऐसे साक्ष्यों की भी कमी नहीं थी, जिनके अनुसार अस्पृश्य बिल्कुल नहीं हैं। यह विचित्र स्थिति थी कि हिंदू साक्ष्य अस्पृश्यों के अस्तित्व को बिल्कुल अस्वीकार करते अथवा उनकी संख्या नगण्य बताकर सच्चाई पर पर्दा डाल रहे थे। इस षड्यंत्र में प्रांतीय मताधिकार समिति के सदस्य भी शामिल थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि लोथियन समिति के हिंदू सदस्य भी इस कुचक्र में सम्मिलित थे। अस्पृश्यों के अस्तित्व को अस्वीकार करना अथवा उनकी संख्या नगण्य बताने के प्रयास तो कुछ प्रांतों में बुलंदियों पर थे। हिंदू उनको पूरी तरह कैसे छिपा रहे थे, यह बात अस्पृश्यों की समस्या पर निम्नलिखित आंकड़ों से स्पष्ट होती है। वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश में जनगणना आयुक्त के अनुमान के अनुसार अस्पृश्यों की जनसंख्या 01 करोड़ 26 लाख थी_ प्रांतीय सरकार के अनुसार 68 लाख थी, जबकि मताधिकार समिति ने केवल 6 लाख ही बताई थी। बंगाल में जनगणना के अनुसार संख्या 01 करोड़ 3 लाख, प्रांतीय सरकार के अनुसार 01 करोड़ 12 लाख तथा प्रांतीय मताधिकार कमेटी के अनुसार केवल 07 लाख थी।

गोलमेज सम्मेलन से पूर्व किसी भी हिंदू ने अस्पृश्यों की सही जनसंख्या जानने की कोशिश नहीं की। वे जनगणना के आंकड़ों से संतुष्ट थे, जिनमें अस्पृश्यों की संख्या 7 से 8 करोड़ बतलाई गई थी। जब लोथियन समिति ने इस प्रश्न पर विचार करना आरंभ किया, तब हिंदुओं ने जनसंख्या के उन आंकड़ों को अचानक उस