4. हिंदुओं का विरोध - Page 27

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को सांप्रदायिक योजना बताया। जैसा कि मैंने बताया है, इस विभेद का

कोई आधार नहीं है। यह सुविधा धर्म की मिसाल है। ऐसे हथकंडों से

उस वर्ग को कोई लाभ नहीं पहुंच सकता, जो पीढि़यों से निर्बल वर्ग

है। मैं तथाकथित राष्ट्रीय योजना के गुणों की समीक्षा करते हुए इसकी

असलियत बताना चाहता हूं। इससे पहले दोनों योजनाओं के स्वीकार्य

पक्षों का जिक्र करना वांछनीय है। दोनों का समान उद्देश्य है क्योंकि

दोनों प्रतिनिधि व्यवस्थापिका के पक्षधर हैं। मतभेद का मुद्दा उस तरीके

पर है, जिससे वह वास्तविक प्रतिनिधि संस्था बन सकेगी। तथाकथित

राष्ट्रीय योजना भारतीय व्यवस्थापिका हेतु केवल क्षेत्राधारित निर्वाचन क्षेत्र

को पर्याप्त समुचित व्यवस्था स्वीकार करती है। जिसे सांप्रदायिक योजना

कहा जा रहा है, वह यह नहीं मानती कि क्षेत्राधारित निर्वाचन क्षेत्र से

व्यवस्थापिका वास्तविक प्रतिनिधित्व करेगी, क्योंकि आज भारत का विशेष

सामाजिक आधार है। मुद्दा यह है कि क्या क्षेत्राधारित निर्वाचन क्षेत्र भारत

में वास्तविक प्रतिनिधि व्यवस्थापिका बन सकते हैं। इसी प्रश्न पर विवाद

मौजूद है।

हिन्दुओं की तथाकथित राष्ट्रीय योजना पश्चिमी देशों से अपील करती है कि वे तथाकथित सांप्रदायिक योजना के मुकाबले उसे प्राथमिकता दें। इसका कारण यह है कि पश्चिमी देश जानते है और वे भौगोलक निर्वाचन क्षेत्रें के ही अभ्यस्त हैं। परंतु निस्संदेह तथाकथित राष्ट्रीय योजना गुणानुसार बहुत ठोस नहीं है और इसके इरादे सांप्रदायिक से भी बदतर है।

यह लचर है कि कोई इसकी मीमांसा नहीं करेगा। भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र के क्या गुण अवगुण है? वे संभावनाएं क्या हैं? उनमें से कुछेक का विवरण दिया जा रहा हैः-

(1) इसमें निर्वाचन क्षेत्र में बहुसंख्यक मतदाताओं का वर्चस्व होगा, जिससे

पूरे निर्वाचन-क्षेत्र की इच्छा प्रतिबिंबित होगी।

(2) प्रतिनिधि के लिए ही काफी होगा कि वह निर्वाचन क्षेत्र की सामान्य भावना

का ध्यान रखेगा, जिससे उसे बहुमत दिलाया है और वह एक समुदाय

विशेष का प्रतिनिधि होगा, चाहे वह बहुमत कितना भी क्यों न हो यदि वह

बहुमत कितना ही क्यों न हो यदि वह बहुमत की अनदेखी करेगा तो बिना

किसी सोच विचार के उसकी सरलता से उपेक्षा कर दी जाएगी।

(3) जिन मतों से प्रतिनिधि चुना जाएगा उन्हीं की इच्छा और हितों को

देखकर वह कार्य करेगा। यह आशंका नहीं रहेगी कि वह प्रतिनिधि

अपने ही वर्ग का हित रक्षण करेगा और अपने मतदाताओं की अनदेखी