हिंदुओं का विरोध 11
करके काम करेगा।
ये सारे अनुमान झूठे हैं और किसी भी सिद्धांत के अनुसार न्याय-संगत नहीं है। इसका कभी प्रयोग भी नहीं गया है। संसदीय सरकार का इतिहास बताता है कि इंगलैंड तक के इतिहास में यह कहानी मिलती है। ऐसा सोचना गलत है कि अधिकांश स्थितियों में विश्वास कर लिया जाए कि देश में सभी वर्गों की कामनाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है। वास्तव में संतोषप्रद ढंग से ऐसा नहीं हो सकता। यदि यह संबंध में सामान्य अपेक्षाओं की कोई हल्की सी झलक मिलती भी है तो यह इस पर निर्भर करता है कि निर्वाचन क्षेत्र के विभिन्न वर्गों के कितने सारे समान हित हैं और उनमें कितनी विविधता है और उनके बीच कितनी समरसता है। स्वाभाविक हैं भारत के समान हित है ही नहीं। जहां संपूर्ण और निष्पक्ष समरसता नहीं है और विभिन्न वर्गों की भागीदारी का मार्ग अवरुद्ध है वहां कोई वर्ग छोटा हो या बड़ा एक दूसरे का हित नहीं सोचता। बहुमत की इच्छा बहुत की इच्छा के सिवाय कुछ नहीं। इस प्रवृति को कोई तर्क बदल नहीं सकता। इस तरह बहुमत को उत्पीड़न की खुली छट होगी।
फिर यह संभावना भी गलत है कि व्यवस्थापिका के लिए चुना गया प्रतिनिधि उन मतदाताओं की आकांक्षाएं पूरी करेगा ही, जो उसे चुनेंगे और उस वर्ग के हितों, को भूल जाएगा या उनकी अनदेखी कर देगा, जिस वर्ग से वह सम्बद्ध है। प्रतिनिधित्व की बात खण्डित वफादारियों का मामला है। इसके दो बल्कि तीन विषय में टकराव होंगे। (1) स्वयं के हित, (2) जिस वर्ग से यह सम्बद्ध है उसके हित और (3) उन मतदाताओं के हित जिन्होंने उसे चुना है। पहली बात को हम भूल भी जाएं फिर भी यह अनुभव की बात है कि प्रतिनिधि उसे मतदाताओं से पहले अपने वर्ग का हित सोचेगा। इससे अलग कोई कुछ और सोचेगा भी क्यों? यह स्वाभाविक है कि उसका स्वयं का स्वार्थ निर्वाचन क्षेत्र से ऊपर ही रहेगा। यह एक कहावत है कि मनुष्य की
खाल उसकी कमीज से ज्यादा नजदीक होती है। व्यवस्थापिका सदस्य पर भी यह बात लागू होती है कि उसका वर्ग तो उसकी खाल है और निर्वाचन क्षेत्र कमीज होती है, जिसके विषय में यह कहना व्यर्थ है कि उसका स्थान खाल के बाद ही है।
हिंदू इसीलिए भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों की दुहाई दे रहे हैं और राजनीतिक ढांचे की बुनियाद उसी आधार भूमि पर रख रहे हैं, जिसे सभी राजनीतिक नियंताओं ने कमजोर बताया है। भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र यूरोपीय देशों की राजनीतिक पद्धति में भी अविश्वनीय माने जा रहे हैं। कई यूरोपीय देशों में प्रतिनिधित्व का आधार भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र था, वहां उसे बदला जा रहा है और दूसरी व्यवस्था कर दी गई है क्योंकि भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों से काम नहीं चला। जहां यह प्रणाली लागू है, वहां भारी अंसतोष है, जिसका कारण यही भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र प्रथा है। व्यावसायिक और कार्यकारी प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव हैं, और जनमतसंग्रह के प्रस्ताव हैं कि पुरानी व्यवस्था बदली जाए।