4. हिंदुओं का विरोध - Page 29

12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इन परिस्थितियों में यह आशंका उत्पन्न होती है कि हिंदू उस राजनीतिक पद्धति पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं, जिसे अन्यत्र तिरस्कृत कर दिया गया है। कारण यह बताया जाता है कि यह एक मात्र पद्धति है, जो राष्ट्रवाद के अनुकूल है। मेरे मस्तिष्क में वास्तविक व्यवस्था कुछ और ही है। हिंदू भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र को इसलिए प्राथमिकता देता है कि उसे पता है कि वह तमाम राजनीतिक सत्ता प्राप्त करके अपनी मुट्ठी में बंद कर लेगा। इस हिसाब को कौन नकार सकता है? हिन्दू जानता है कि भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबली भारी हिंदू बहुमत और अल्पमत अछूतों के बीच होगा। यदि निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक होगा तो वे सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जीत जाएंगे। हिन्दू अपने बहुमत के अतिरिक्त अन्य कारणों से भी मजबूत हैं जिससे उनका बहुमत सुदृढ़ होगा। वह कारण है हिंदू धर्म की विशिष्ट जीवन शैली। हिंदू समाज में जाति का स्थान सर्वोत्तम है और दूसरा कारण है चुनावों का परिणाम। हिंदू व्यवस्था में जातियों का निर्धारण इस प्रकार का है- सम्मानितों की स्थिति ऊँची होती है और प्रताडि़तों की नीची। यह भविष्यवाणी करने की आवश्यकता नहीं कि मतदान में कौन सी प्रवृति काम करेगी। कोई सवर्ण हिंदू किसी अछूत को वोट नहीं देगा, क्योंकि उसकी दृष्टि वह इतना निकृष्ट है कि वह व्यवस्थापिका में जाने योग्य नहीं है। दूसरी ओर बहुत से अछूत मतदाता हिंदू उम्मीदवारों को मत देंगे, क्योंकि वह उनकी दृष्टि में उनसे और उनके अछूत भाई से बेहतर व्यक्ति है। इसका कारण यह है कि उसे पहले से बतलाया गया है कि स्वर्ण हिन्दू उसके अछूत भाइयों से बेहतर हैं। मैं दूसरे तरीके का जिक्र नहीं करता जो गरीबों, अशिक्षितों, नासमझों और अंसगठित लोगों का वोट प्राप्त करने के लिए अपनाए जाते हैं, जो अछूत हैं। ये सब परिस्थितियां मिलकर हिंदुओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में काम करेंगी। शुद्ध भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र पद्धति से हिंदुओं का बहुमत निश्चित होगा। वे स्वयं अपना बहुमत बनाएंगे और साथ ही अछूतों को भी मिला लेंगे। यह भी निश्चित है कि अछूतों की सभी सीटें छीन जाएंगी। वे पहले ही अल्प मत में हैं फिर हिन्दू उन्हें उनकी कमजोरी के कारण पटा लेंगे और वे अपने वोट हिंदुओं को वैसे ही अर्पित कर देंगे जैसे भगवानको बलि चढ़ाई जाती है।

भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र बना दिए जाने से हिंदुओं को राजनीतिक सत्ता हड़पने का अवसर मिल जाएगा। यदि सांप्रदायिक निर्वाचन बनाए जायेंगे तो यह सत्ता अछूतों के हाथ में रहेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि वो चाहे इरादा न भी हो राष्ट्रीय योजना उनके अनुकूल परिणामों पर आधारित है, जो सांप्रदायिक योजना से बेहतर होगी।