अध्याय-5
संयुक्त बनाम पृथक मतदान
काफी जद्दोजहद के बाद हिन्दुओं ने यह स्वीकार किया है कि शुद्ध भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्र योजना भारत जैसे देश में नहीं चल सकती। सच्चे प्रतिनिधित्व हेतु भौगोलिक और सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र के विषय में जो कुछ कहा उसका कारण है कि मैं सौंचता हूं कि जो विदेशी भारतीय राजनीतिक स्थितियों से अवगत नहीं है, उन्हें विवाद की अवधारणा का सही मुद्दा समझना होगा। दुर्भाग्य से सच्चाई यह है कि हालांकि हिन्दुओं ने सांप्रदायिक योजना को स्वीकार कर लिया है परन्तु वे अछूतों की पूर्ण मांग से सहमत नहीं हो पाए हैं। अछूतों की मांग है कि उनके मतदाता पृथक हों। पृथक मतदाताओं का अर्थ है ऐसे मतदाता जो केवल अछूत हों और वे ही विधायिका के अछूत प्रतिनिधि को पृथक मतदान से चुने। हिंदू इस बात पर सहमत हो गए हैं कि कुछ निर्वाचन क्षेत्र अछूतों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं। परन्तु वे इस बात पर जोर देते हैं कि विधायिका में अछूतों का जो प्रतिनिधि हो उसका निर्वाचन हिंदू और अछूत दोनों संयुक्त रूप से करें केवल अछूत ही उसे चुने। इस संबंध में भी मैं इस विवाद के दोनों पक्ष पेश करना चाहता हूं। पृथक मतदान पर हिंदुओं ने आपत्ति उठाई है कि पृथक मतदान का अर्थ होगा, राष्ट्र के टुकड़े करना। उत्तर स्वाभाविक है। भारत तकनीकी रूप में कोई राष्ट्र नहीं है। राष्ट्र स्वयं कुछ नहीं होता उसे बनाया जाता है और मैं सोचता हूं कि यह स्वीकार किया जाएगा कि एक समुदाय विशेष का दमन और पृथक्क्रण राष्ट्र का निर्माण कोई तरीका नहीं है। दूसरी बात है कि हिन्दुओं ने भी स्वीकार किया है कि व्यवस्थापिका में अछूतों का प्रतिनिधित्व अछूत ही करें, तब इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अछूत प्रतिनिधि अछूतों के वोटों से ही चुना जाएं। यदि यह सही है तो पृथक मतदान ही एकमात्र पद्धति है जिससे अछूतों के लिए सच्चा प्रतिनिधित्व हो सकता है। पृथक मतदान के विरूद्ध हिंदुओं का तर्क थोथा और असमान्य है। जिस धरातल पर अछूतों की मांग आधारित है, उसे हिंदुओं ने स्वीकार कर लिया है। पृथक मतदान ही ऐसा निष्कर्ष हो सकता है