7. सरकारी सेवाएं - Page 36

अध्याय-7

सरकारी सेवाएं

अछूतों की मांग है कि देश में न्यूनतम योग्यता के आधार पर सरकारी सेवाओं में एक निश्चित अनुपात अछूतों के लिए आरक्षित किया जाए। हिंदू जैसे अछूतों की अन्य मांगों का विरोध करते हैं वैसे ही इसका भी करते हैं। इनका कहना है कि क्षमता और कार्यकुशलता सरकार के लिए आवश्यक है और नौकरियों का आधर वही रहना चाहिए न कि जाति न वर्ग। अनिवार्य योग्यताओं के विषय में कोई विवाद नहीं है, न ही क्षमता और कार्यकुशलता के मापदंड के बारे में कोई मतभेद है। मतभेद का एक ही कारण है और वह बहुत महत्वपूर्ण है। वह है कि क्या जाति और वर्ग का सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए ध्यान रखा जाए? केवल शैक्षिक योग्यता पर टिके रहने के बजाए हिंदू इस बात पर बल देते हैं कि सरकारी नौकरियों में नियुक्तियां सभी वर्गों की खुली प्रतियोगिता के आधार पर की जाएं। उनका तर्क है कि इससे दोनों उद्देश्यों की पूर्ति हो जाएगी। यह व्यवस्था कार्यकुशलता के उद्देश्य को पूरा करेगी। दूसरे इससे अछूतों को सरकारी नौकरियों में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध भी न होगा।

हिंदू अछूतों की मांग का विरोध यह कह कर जता रहे हैं कि कार्यकुशलता और प्रतियोगिता ही विश्वसनीय व्यवस्था है। इसके लिए भी तर्क असली मुद्दे से हट कर दिया जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या सरकारी नौकरियों के लिए कार्यकुशल व्यक्तियों को चुनाव प्रतियोगिता के आधार पर किया जाना ही उचित है। प्रश्न यह है क्या मात्र यही कर देने से अछूत उम्मीदवार नौकरियों में आ जाएंगे कि प्रतियोगिता जाति और वर्ग का भेद किए बिना सबके लिए खुली होगी। यह देश की प्रणाली पर निर्भर है। क्या शिक्षा यथोचित रूप से लोकतांत्रिक है? क्या शिक्षा सुविधाओं का व्यापक विस्तार है? अन्य वर्गों के लोगों को प्रतियोगिता के अवसर मिलते हैं। यदि नहीं, तो सभी वर्गों को खुली प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए कहना अंधेर है। भारत में यह मूल स्थिति की धोखे की जननी है। भारत में उच्च शिक्षा पर हिंदुओं का एकाधिकार है और वह भी ऊंची जातियों का। इस समाज में