8. अलग बस्तियां - Page 38

अध्याय-8

अलग बस्तियां

प्रस्ताव संख्या 4, जिसका उल्लेख इस लेख के पहले भाग में किया गया है, मैं समझता हूं वह स्वयं ही एक व्याख्या है और उसके लिए विस्तृत टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है और इस संक्षिप्त प्रबंध लेख में इससे अधिक विवरण देना संभव भी नहीं है। अलग बस्तियों की मांग अछूतों के लिए नव-जीवन आंदोलन कहीं जा सकती है। इस आंदोलन का उद्देश्य अछूतों को हिंदुओं की दास्ता से मुक्त कराना है। जब तक मौजूदा व्यवस्था रहेगी, तब तक अछूतों के लिए यह संभव नहीं हो सकेगा कि वे हिंदुओं से दूर जा सकें या अस्पृश्यता से छुटकारा पा सकें। अछूतों का भाग्य हिन्दुओं के साथ गहनता से गुथा हुआ है कि वे उन्हें अछूत बना देते हैं जिससे उनकी पहचान अछूतों के रूप में होती है। निस्संदेह भारत एक ग्राम प्रधान देश है और जब तक ग्रामीण जीवन में उन्हें अछूतों के रूप में जाना जाता रहेगा, अछूतों को अस्पृश्यता से मुक्ति नहीं मिल सकती। ग्रामीण व्यवस्था अस्पृश्यता को जीवित रखती है और इसलिए अछूत यह मांग करते हैं कि ग्रामीण व्यवस्था को भंग किया जाए और अछूत सामाजिक रूप से पृथक बना दिये गये हैं, उन्हें भौगोलिक और क्षेत्रीय दृष्टि से भी पृथक कर दिया जाए और उनके अलग गांव बसाएं जाएं, जिसमें ऊंच-नीच और छूत-अछूत का भेद मिट जाएगा।

अछूतों की अलग बस्तियों के लिए मांग गांवों में अछूतों की आर्थिक दशा के कारण भी उठाई गई है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनकी दशा अत्यंत दयनीय है। वहाँ कुछ भूमिहीन मजदूर हैं, वे रोटी-रोजी के लिए हिंदुओं पर निर्भर करते हैं। हिंदू उन्हें जितनी मजदूरी पर रखना चाहें वह उन्हें मंजूर करनी होती है। जिन गांवों में वे रहते हैं, वहां वे कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं कर सकते। अस्पृश्यता के कारण हिंदू उनसे कोई सहयोग नहीं करेंगे, इसलिए यह स्वाभाविक है कि अछूत जिस व्यवसाय को करना चाहेंगे, जब तक वे हिंदुओं के गावों में रहेंगे