अलग बस्तियां 23
हिंसा कुछ सीमा तक नहीं हो पाती है। इसी कारण ऐसी घटनाएं गिनी-चुनी
ही होती हैं।
दूसरी कठिनाई दलितों की मौजूदा आर्थिक स्थिति है। प्रेसीडेंसी के अधिकांश भागों
में दलित आर्थिक दृष्टि से पराश्रित हैं। कुछ लोग कट्टरपंथी वर्गों की जमीन
आसामियों की हैसियत से उनकी मर्जी पर जोतते हैं। कुछ कट्टरपंथियों के यहां
खेत मजदूरों के रूप में काम करते हैं बाकी गांव की खिदमत के बदले में मिलने
वाले खाने या अनाज पर गुजारा करते हैं। हमें ऐसे बहुत से मामले सुनने को
मिले हैं, जहां कट्टरपंथियों ने अपनी धन-सत्ता को दलितों के विरूद्ध हथियार
के रूप में इस्तेमाल किया है। जब दलितों ने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहा,
तो उनकी जमीन छीन ली गई, उनको काम से निकाल दिया गया और गांव
की सेवा से उन्हें हटा दिया गया। उनका बहिष्कार इस हद तक किया जाता है
कि उन्हें आम रास्तों पर नहीं दिया जाता और गांव के बनिए उन्हें रोजमर्रा की
जरूरत की चीजें नहीं बेचते। ऐसी बातें भी बताई गई हैं कि कभी-कभी छोटी
मोटी बातों पर भी दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। अधिकतर
तो तब जब दलित जातियों को लोग सार्वजनिक कुओं से पानी लेने की कोशिश
करते हैं, ऐसी घटनाएं घटती हैं। परन्तु ऐसे मामले भी कम नहीं हैं, जब इसी
बात पर दलितों का कठोर बहिष्कार कर दिया जाता है कि वे जनेऊ पहन लेते
हैं, जमीन का कोई टुकड़ा खरीद लेते हैं, अच्छे वस्त्र या जेवर पहन लेते हैं या
उनको बारात में दुल्हें को घोड़ी पर चढ़ाकर निकाला जाता है।’’
अलग बस्तियां बसाए जाने की मांग एक नई मांग है, जो अछूतों ने पहली बात रखरी है। यह कहना संभव नहीं है कि हिंदू इस मांग पर क्या रवैया अपनाएंगे। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि अछूतों द्वारा पेश की गई यह सबसे महत्वपूर्ण मांग है और मुझे विश्वास है कि अन्य मांगों के बारे में कुछ भी हो वे इस मांग पर नहीं झुक सकते। हिंदुओं की यह सोच है कि हिंदुओं और अछूतों का संबंध ईश्वर ने बनाया है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है कि, पति अपनी पत्नी से जुड़ा है और वे बाइबल की भाषा बोलेंगे कि जो प्रभु इच्छा से मिलाए गए हैं कोई मनुष्य उन्हें जुदा नहीं कर सकता। अछूतों ने प्रण कर लिया है कि हिंदुओं के साथ ऐसे किसी भी संबंध को वे स्वीकार नहीं करते। वे इस रिश्ते को तोड़ देना चाहते हैं और हिंदुओं से अविलंब अलग हो जाना चाहते हैं।
इस संबंध में केवल एक प्रश्न उठता है कि इस कार्य पर आने वाला खर्च कौन उठाएगा? खर्च के बारे में अछूत कहते हैं कि वह सरकार उठाए। इसमें कोई संदेह