9. जाति और संविधान - Page 42

अध्याय-9

जाति और संविधान

यह प्रश्न न्यायसंगत है कि अछूतों की मांगों को संविधान में क्या शामिल किया जाए? विश्व में कहीं भी संविधान निर्माताओं के समक्ष यह विवशता नहीं थी कि वे ऐसे मामलों को देखें। मैं मानता हूं कि यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और जो इस प्रश्न को उठा रहे हैं या इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इसका संवैधानिक महत्व है, इसके उत्तर की उनसे ही अपेक्षा है। मेरी दृष्टि में इसका उत्तर स्वाभाविक है। भारत की सामाजिक व्यवस्था से ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इसका संवैधानिक महत्व है। केवल हिंदुओं की जाति प्रथा और सामाजिक व्यवस्था ही इसके लिए उत्तरदायी है। विदेशियों के समक्ष यथोचित व्याख्या के लिए हिंदू-समाज और धर्म-व्यवस्था के फलितार्थ बताने के लिए यह संक्षिप्त वक्तव्य पर्याप्त नहीं है बल्कि यह भी सत्य है कि इस रिपोर्ट की सीमित परिधि में यह बताना असंभव है कि जाति प्रथा के संविधान में क्या फलितार्थ होंगे। मैं जातियों के उन्मूलन संबंधी अपनी पुस्तक में इस पर पूरी तरह प्रकाश डालूंगा, जिसे मैंने कुछ दिन पूर्व लिखा है। मुझे विश्वास है कि इससे हिंदुओं की जाति और धार्मिक व्यवस्था के सामाजिक और आर्थिक पक्ष पर काफी प्रभाव डाला गया है। इस प्रबंध लेख में मैं संक्षेप में निम्नांकित सामान्य जानकारी पेश करुंगा। संविधान की रचना में सामाजिक ढांचे का सदैव ध्यान रखना होता है। सामाजिक तत्वों की सक्रियता केवल सामाजिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहती। वे राजनीति में भी घुस जाते हैं। अछूतों का यही विचार है और मुझे विश्वास है कि यह तथ्य निर्विवाद है। हिंदू इस दलील और इसकी प्रबलता से पूरी तरह अवगत है। परन्तु वे इस बात से मुकर जाएंगे कि हिंदू समाज व्यवस्था यूरोपीयन समाज व्यवस्था से भिन्न है। वे इस तर्क का उत्तर देने के निलए यह कहेंगे कि हिंदुओं की जाति प्रथा और पश्चिमी समाज की वर्ग व्यवस्था के बीच कोई भेद नहीं है। यह वास्तव में सफेद झूठ है और वे फिर भी यह साबित कर देंगे कि वे वर्ग व्यवस्था और जाति व्यवस्था का भेद ही नहीं जानते। जाति प्रथा का मूल है विलगाव और इसमें एक